पुलिस का फर्जीवाड़ा…3 साल जेल में रहे बेकसूर पिता-पुत्र: काला लोअर पहने था मृतक, 4 महीने बाद जंगल से पुलिस ढूंढ लाई नीला – Madhya Pradesh News

पुलिस का फर्जीवाड़ा…3 साल जेल में रहे बेकसूर पिता-पुत्र:  काला लोअर पहने था मृतक, 4 महीने बाद जंगल से पुलिस ढूंढ लाई नीला – Madhya Pradesh News


युवक के अंधे कत्ल के मामले में जब पुलिस को 4 महीनों तक हत्यारा नहीं मिला तो पुलिस ने न केवल फर्जी सबूत जुटा लिए, बल्कि हत्या का प्रत्यक्षदर्शी गवाह भी ढूंढ लाई। पुलिस की कहानी के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने आदिवासी पिता-पुत्र को उम्रकैद भी सुना दी, लेकिन

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मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा। तब खुलासा हुआ कि पुलिस के सारे सबूत मनगढंत हैं। इस बीच तीन साल गुजर गए। ये तीन साल पिता-पुत्र ने बेकसूर होते हुए भी सलाखों के पीछे काटे। हाईकोर्ट ने दोनों को बरी करते हुए पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी की और ऐसी जांच करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर विभागीय जांच के निर्देश भी डीजीपी को दिए।

बिना किसी जुर्म के तीन साल जेल में रहने वाले पिता–पुत्र अब घर पहुंच चुके हैं, लेकिन न तो कोई उनके इन तीन सालों का हिसाब देने वाला है न ही ऐसा करने वालों की जिम्मेदारी ही तय होती दिख रही है।

नैनसिंह ने भास्कर से आपबीती साझा की।

पूरी कहानी जानने के लिए दैनिक भास्कर की टीम छत्तीसगढ़ की सीमा के पास बसे मंडला जिले के अतरिया गांव में पहुंची।

सिलसिलेवार समझिए पूरा मामला …

मंडला जिले की बिछिया तहसील से 15 किलोमीटर दूर कान्हा टाइगर रिजर्व की सीमा पर बसा है छोटा सा अतरिया गांव…। यहां बमुश्किल 150 घर हैं। इसी गांव में रहते हैं 50 वर्षीय नैन सिंह धुर्वे। पिता सरपंच रह चुके हैं, नैनसिंह 10 एकड़ जमीन पर जैविक खेती करते थे और एक समाजसेवी संस्था से जुड़कर दूसरे किसानों को भी जैविक खेती के फायदे समझाते थे। 2021 तक सबकुछ ठीक चल रहा था। देश–दुनिया में कोरोना महामारी फैली हुई थी, लेकिन जंगल से लगे इस गांव में सब सामान्य ही था, लेकिन इसके बाद की इस परिवार की जिंदगी पूरी तरह बदल गई।

नैनसिंह का परिवार इसी घर में रहता है।

नैनसिंह का परिवार इसी घर में रहता है।

वो घटना जानिए, जिससे इनकी जिंदगी बदली

नग्न हालत में मिली राजेंद्र की लाश

20 सितंबर 2021 में गांव का राजेंद्र पेंद्रे नाम का युवक अचानक लापता हो गया। परिवार और ग्रामीणों ने उसकी तलाश शुरू की, लेकिन कई दिनों तक उसका कोई सुराग नहीं मिला। 25 सितंबर की सुबह ग्रामीणों ने नजदीक के जंगल में राजेंद्र की लाश देखी। उसके शरीर का निचला हिस्सा नग्न था। कपड़े नहीं थे और प्राइवेट पार्ट कटा हुआ था। गांव सहित आसपास के गांवों में सनसनी फैल गई। माैके पर सैकड़ों लोग इकट्‌ठे हो गए। बिछिया थाने की पुलिस मौके पर पहुंची, शव का पंचनामा बनाया।

पुलिस ने लोगों से कहा कि आसपास तलाश करें जिससे कोई सबूत मिल जाए जो जांच में काम आए। गांवों के सैकड़ों निवासी तलाशने में जुट गए लेकिन किसी को कुछ नहीं मिला। पुलिस को पता चला कि मृतक की बातचीत गांव के ही नैन सिंह धुर्वे की छोटी बेटी से होती है।

पुलिस ने पूछताछ की, लेकिन कुछ सामने नहीं आया। जांच के लिए लड़की के मोबाइल को जब्त किया गया, लेकिन पुलिस के हाथ अब भी खाली थे।

बिछिया थाने की पुलिस मामले की जांच कर रही थी।

बिछिया थाने की पुलिस मामले की जांच कर रही थी।

चार महीने बाद अचानक बदली तस्वीर

सितंबर के बाद चार महीने बीत गए सबकुछ पहले की तरह सामान्य हो गया। इसी बीच 2 फरवरी को गांव के नैन सिंह धुर्वे को पुलिस ने थाने बुलाया। थाना प्रभारी ने कहा, आपकी बेटी का मोबाइल जमा है ले जाना और कुछ बातें करनी है।

धुर्वे बताते हैं, यहीं से मेरी जिंदगी ने मोड़ ले लिया। थाना प्रभारी ने मुझे और बेटे को थाने में बैठा लिया कहा कि कुछ घंटे में चले जाना। इस तरह रात हो गई और अगले दिन भी थाने में बैठाए रखा, रिश्तेदार आए मान-मनुहार करके चले गए, लेकिन पुलिस ने न तो कुछ बताया और न ही हमें घर ही जाने दिया। अगले दिन हमें अस्पताल ले गए, जहां जांच के बाद कोर्ट लेकर गए। वहां भी किसी ने कुछ नहीं पूछा न सुना और हमें मंडला जेल भेज दिया।

पुलिस की कहानी पर सेशन कोर्ट ने सुनाई सजा

नैनसिंह के एडवोकेट राजेंद्र मरावी बताते हैं, मर्डर के मामले में सेशन कोर्ट में ट्रायल शुरु हुआ तो पुलिस ने बताया कि घटनास्थल के पास से मृतक का लोअर और हत्या में उपयोग किया गया हथियार मिला है। मोबाइल रिकार्ड से पता चला है कि नैनसिंह की बेटी मृतक राजेंद्र से बात करती थी।

पुलिस ने एक गवाह चैनसिंह भी पेश किया जिसने बयान दिया कि हत्या की रात मैं नैनसिंह के घर ही रुका था। रात को शोर सुना तो देखा कि नैनसिंह और संदीप किसी को मार रहे थे, लेकिन वह मार खाने वाले को पहचान नहीं पाया। इसके बाद सेशन कोर्ट ने नैनसिंह और संदीप को हत्या के आरोप में दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुना दी।

आजीवन कारावास मिलते ही पिता–बेटे को सेंट्रल जेल भेज दिया, जहां उनका जीवन और कठिन हो गया। घर से 150 किलोमीटर दूर जेल तक परिवार वाले पहुंच तक नहीं पाते थे।

नैनसिंह ने हमें वो जगह दिखाई जहां वो मवेशी बांधते थे। जेल जाने के बाद मवेशियों की देखरेख करने वाला कोई नहीं बचा और पैसों की भी तंगी हुई तो परिवार ने कई मवेशी बेच दिए।

नैनसिंह ने हमें वो जगह दिखाई जहां वो मवेशी बांधते थे। जेल जाने के बाद मवेशियों की देखरेख करने वाला कोई नहीं बचा और पैसों की भी तंगी हुई तो परिवार ने कई मवेशी बेच दिए।

तीन साल बाद आया राहत का दिन

हाईकोर्ट ने दोनों को किया बरी

एडवोकेट राजेंद्र मरावी बताते हैं, हाईकोर्ट ने 5 अगस्त 2025 को दिए गए निर्णय में 2021 में राजेंद्र की हत्या के मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने आरोपी पिता नैन सिंह धुर्वे और बेटे संदीप को बरी कर दिया। अदालत ने इस मामले की जांच पर गंभीर आपत्ति जताई और जांच अधिकारी सहित संबंधित पुलिस वालों के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए।

पिता का दर्द…डिप्रेशन में बेटा

नैन सिंह धुर्वे ने भास्कर से अपना दर्द साझा करते हुए कहा कि बेटा संदीप बालाघाट में पढ़ता था। 10 वीं में उसके 82 प्रतिशत नंबर आए थे, फिर 12 वीं में 84 प्रतिशत आए। हमें पूरी उम्मीद थी उसकी सरकारी नौकरी लग जाएगी। वह डॉक्टर बनना चाहता था।

मैं जानता था कि वह बहुत अच्छा करेगा, लेकिन यह नहीं पता था कि वह मेरे साथ जेल जाएगा। सालों–साल रोते–रोते गुजारेगा।

कोर्ट में फर्जी साबित हुए पुलिस के 3 सबूत…

1. कॉल डिटेल की टाइमिंग गड़बड़

– एडवोकेट राजेंद्र मरावी बताते हैं, कोर्ट में सीडीआर जांचने वाले अधिकारी सुरेश भटेरे ने बयान दिया कि मृतक और नैनसिंह की छोटी बेटी के बीच 20 से 25 सितंबर के बीच कई बार बात हुई।

20 सितंबर को भी मोबाइल नंबर 74890**** से 93015**** पर रात 9 बजकर 19 मिनट पर 398 सेकंड की इनकमिंग कॉल प्राप्त हुई, लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से साबित हुआ कि राजेंद्र की मौत लाश मिलने के चार से पांच दिन पहले करीब 20 सितंबर को ही हो चुकी थी, ऐसे में बाद में कौन बात कर रहा था। इसने संदेह पैदा किया।

– मरावी कहते हैं, हाईकोर्ट ने दोनों को बरी करते समय कहा कि अभी विज्ञान ने इतनी तरक्की नहीं की, कि मुर्दे मोबाइल पर बात करें।

2. बदला लोअर का रंग

– विवेचना अधिकारी के बयानों में आया कि 25 सितंबर को लाश देखने के लिए 400 से 500 लोग इकट्‌ठे हुए थे, पुलिस ने उनसे कहा था कि आप आसपास तलाश कीजिए कोई सबूत मिले तो पुलिस को दीजिए। इतने लोगों ने ढूंढा, लेकिन कुछ नहीं मिला। 4 महीने बाद पुलिस को उसी जगह से लोअर और छुरा मिल गया।

– गायब होते समय युवक ने पहना था काला लोअर, 4 महीने बाद पुलिस ने बरामदगी के दौरान दिखाया नीला लोअर। यह गड़बड़ी हाईकोर्ट ने गुमशुदगी रिपोर्ट और पुलिस की बरामदगी की रिपोर्ट के बीच में पकड़ी। यह भी पाया कि पुलिस ने न फिंगरप्रिंट लिए, न डीएनए ही मिलवाया।

3. गवाह को प्लांट किया

– गवाह चैनसिंह न बयानों में माना कि उसे केरल से लाया गया। घटना की जानकारी पुलिस ने दी थी और वह स्वयं प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। अदालत ने इसे पुलिस द्वारा गवाह “प्लांट” किए जाने का मामला मानते हुए कहा कि यह गंभीर लापरवाही है।

– जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस ए.के. सिंह की खंडपीठ ने मामले में पुलिस की जांच को अविश्वसनीय करार दिया। अदालत ने कहा कि केवल आरोपपत्र दाखिल करने के लिए झूठ का सहारा लिया गया।

जबलपुर हाईकोर्ट से नैनसिंह और उसके बेटे को राहत मिली।

जबलपुर हाईकोर्ट से नैनसिंह और उसके बेटे को राहत मिली।

डीजीपी को 30 दिन में जांच रिपोर्ट देने के आदेश

कोर्ट ने आरोपी पिता और पुत्र को बरी करने के साथ-साथ जांच अधिकारी की वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से विभागीय जांच कराने का आदेश दिया है। इसके साथ ही मध्य प्रदेश पुलिस महानिदेशक (DGP) को 30 दिनों में रिपोर्ट पेश करने और भविष्य में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी करने का आदेश दिया गया है।

कहां गड़बड़ी हुई जांच करा रहे हैं

मंडला एसपी रजत सकलेचा ने दैनिक भास्कर को बताया कि एडीपीओ कोर्ट के फैसले का अध्ययन कर रहे हैं। कोर्ट के निर्देश के अनुसार केस के जांच अधिकारी की जांच करा रहे हैं, साथ ही यह भी पता किया जा रहा है कि इस केस की जांच में और कौन–कौन से जांच अधिकारी शामिल थे।



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