इन मंदिरों की खासियत यह है कि इनमें स्थापित देवी-देवताओं की प्रतिमाएं अत्यंत अद्भुत और दुर्लभ हैं. कहा जाता है कि ऐसी प्रतिमाएं दुनिया में कहीं और नहीं मिलतीं. स्थानीय मान्यता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान मात्र छह माह की रात्रि इन मूर्तियों और मंदिरों का निर्माण किया था. यहां का गोरी सोमनाथ मंदिर, चौसठ योगिनी, 52 काल भैरव, साढ़े ग्यारह हनुमान और गणेश मंदिर देशभर में प्रसिद्ध है.
मंदिरों के अलावा चोली गांव में कुछ ऐसी ऐतिहासिक धरोहरें भी मौजूद हैं, जिनका अपना अलग महत्व है. इन्हीं में से एक यहां तालाब किनारे बनी दीपशिखा है. यह शिला लगभग 8 फीट ऊंची है और पूरी तरह काले पत्थर से बनी हुई है. दीपशिखा का ऊपरी हिस्सा थोड़ा गहरा और कुंडनुमा है. मान्यता है कि प्राचीन काल में इसमें विशाल दीपक जलाया जाता था, जिसकी रोशनी से पूरा इलाका जगमग हो उठता था.
55 किलोमीटर दूर से दिखता था नजारा
एक किंवदंती के अनुसार, इस दीपशिखा की ज्योति को मांडवगढ़ (मांडू) से भी देखा जा सकता था. यह जगह चोली गांव से करीब 55 किलोमीटर दूर है. मांडू की रानी रूपमती का यह नियम था कि जब तक वे इस दीपशिखा पर जलते दीपक की ज्योति न देख लें, तब तक भोजन नहीं करती थीं. रानी की दिनचर्या ही ऐसी थी कि सुबह के समय वे नर्मदा नदी के दर्शन करतीं और शाम के समय चोली गांव की दीपशिखा को देखकर ही अन्न ग्रहण करतीं.
इतिहासकारों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यह किस्सा लगभग 15वीं शताब्दी का है, जिसे उन्होंने अपने बुजुर्गों से सुना है. कहते है कि, रानी रूपमती का मां नर्मदा के प्रति भी गहरा लगाव था. वह रोजाना धार जिले खलघाट से बहने वाली मां नर्मदा का दर्शन करती थीं, जो मांडू से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इसके अलावा, शाम को वे खरगोन के चोली गांव की दीपशिखा की रोशनी देखकर ही भोजन करती थीं.
बाज बहादुर ने करवाया महल का निर्माण
बताया जाता है कि, रानी की इस आस्था को ध्यान में रखते हुए उनके पति, मालवा के सुल्तान बाजबहादुर ने मांडू की विंध्याचल पर्वत की ऊंची चोटी पर एक विशाल महल का निर्माण करवाया था. रानी इसी महल में निवास करती थी. अब यह महल रानी रूपमती के नाम से ही जाना जाता है. महल इतनी ऊंचाई पर बनाया है कि यहां से रानी को बहती नर्मदा नदी और चोली गांव की दीपशिखा दोनों साफ दिखाई देती थीं.
दीपक रोशनी दूर तक फैलती थी
आज भी जब मौसम साफ होता है तो मांडू से नर्मदा की लहरें और चोली गांव की दीपशिखा, दोनों स्थान स्पष्ट दिखाई देते है. ग्रामीण बताते हैं कि दीपशिखा सिर्फ रानी के लिए ही खास नहीं थी, बल्कि यह पूरे इलाके में आस्था और विश्वास का प्रतीक थी. मंदिर के नजदीक होने से दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को भी राह दिखाती थी. गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि जब इस दीपशिखा पर विशाल दीपक जलता था तो उसकी रोशनी दूर-दूर तक फैल जाती थी.