हिंदूवादी नेता अशोक पालीवाल और अमित जैन।
खंडवा कोर्ट ने धारा 188 के एक मामले में हिंदूवादी नेता अशोक पालीवाल और अमित जैन को बरी कर दिया है। फैसला सेशन कोर्ट ने दिया है, जबकि इसी केस में लोअर कोर्ट ने एक-एक हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी। मामला 1 अगस्त 2016 का है, जब कांवड़ यात्रा के दौर
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खंडवा कोर्ट के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी मनीष रघुवंशी ने 5 सितंबर 2022 को अपने फैसले में अमित, पिता राजेंद्र जैन (34) निवासी सन्मति नगर, नवल, पिता मांगीलाल (38) निवासी सिविल लाइन और अशोक, पिता मदनलाल पालीवाल (47) निवासी हाटकेश्वर वार्ड को सजा सुनाई थी। धारा 188 के तहत दोषी पाए जाने पर तीनों के खिलाफ एक-एक हजार रुपए का जुर्माना लगाया गया था।
कांवड़ यात्रा के आयोजक और हिंदूवादी नेता अमित जैन और अशोक पालीवाल ने इस फैसले को सेशन कोर्ट में चुनौती दी। सेशन कोर्ट के न्यायाधीश (द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश) अनिल चौधरी ने लोअर कोर्ट के फैसले को गलत ठहराया। इस केस को रद्द (अपास्त) करते हुए आरोपियों को बरी कर दिया गया।
कांवड़ यात्रा के दौरान बिना अनुमति डीजे चलाया गया
थाना मोघट रोड पर तत्कालीन एसआई हुकुमचंद चौधरी ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि 1 अगस्त 2016 को कांवड़ यात्रा के दौरान उनकी शेर चौराहा पर यह घटना हुई थी। उस दौरान कानून एवं सुरक्षा व्यवस्था के तहत कलेक्टर की ओर से धारा 144 लगाई गई थी। इसके तहत ध्वनि प्रदूषण अथवा किसी भी प्रकार का शोर-शराबा तथा रैली, जुलूस व यात्रा में डीजे को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित किया गया था।
लेकिन 1 अगस्त 2016 को दोपहर करीब ढाई बजे जिला अस्पताल के सामने से शेर तिराहा तक आम रोड से कांवड़ यात्रा निकाली जा रही थी। इस यात्रा के आयोजक अशोक पालीवाल और अमित जैन ने बिना अनुमति के दो वाहनों (MP09GE6757, MP09GF2192) में भावसार साउंड पंधाना के डीजे साउंड जोर-जोर से बजाए, जिससे काफी शोर-शराबा हुआ और हृदय में कंपन पैदा होकर कानों की सुनने की क्षमता प्रभावित हुई।
कांवड़ यात्रा में उक्त दोनों वाहनों के वाहन मालिक, डीजे मालिक और आयोजक अशोक पालीवाल, अमित जैन ने कलेक्टर के आदेश का उल्लंघन किया। इसके बाद केस दर्ज कर आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करने की अनुमति ली गई और 26 दिसंबर 2016 को परिवाद प्रस्तुत किया गया। लोअर कोर्ट में लगभग 6 साल तक ट्रायल चला और 5 सितंबर 2022 को एक-एक हजार रुपए जुर्माने की सजा दी गई।
सेशन कोर्ट ने माना- यात्रा परंपरागत थी, परमिशन जरूरी नहीं
8 सितंबर 2025 को सेशन कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि लोअर कोर्ट का निर्णय विधि सिद्धांतों और प्रकरण के तथ्यों के विपरीत होने के कारण अपास्त किए जाने योग्य है। कांवड़ यात्रा हर साल सावन के महीने में परंपरा अनुसार निकाली जाती है। शहर और आसपास के समाजजन कांवड़ यात्रा में शामिल होते हैं।
परंपरा अनुसार निकाले जाने वाले किसी भी जुलूस के लिए एसडीएम की परमिशन जरूरी नहीं होती है। न ही इस प्रकरण में किसी गवाह ने अभियोजन का समर्थन किया है। इससे आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं। इसलिए आवेदक दोषमुक्त किए जाने के प्रबल अधिकारी हैं। लोअर कोर्ट के 5 सितंबर 2022 के आदेश को निरस्त करते हुए आवेदकों को दोषमुक्त किया जाता है।