ग्वालियर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामले में बरी होने के बाद कर्मचारी को बिना विभागीय जांच के नौकरी से नहीं हटाया जा सकता। यह मामला राधारमण मिश्रा का है, जो 1976 में पुलिस विभाग में कांस्टेबल बने थे। 1988 में
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हाईकोर्ट की युगल पीठ ने 2005 में सबूतों के अभाव में मिश्रा को बरी कर दिया। फिर भी विभाग ने 2007 और 2012 में उनके पुनर्स्थापन के आवेदन खारिज कर दिए। मिश्रा फिर से कोर्ट गए और कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लाभ के संदेह पर बरी होना भी दोष मुक्ति है। इसका कानूनी प्रभाव पूर्ण बरी होने के समान है। विभागीय अधिकारियों द्वारा याचिकाकर्ता की अपीलों की अनदेखी प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है।
सेवा को निरंतर मानते हुए सेवानिवृत्ति के लाभ दें
हाईकोर्ट ने मिश्रा की 1996 की बर्खास्तगी और 2007 व 2012 के आदेशों को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि मिश्रा को सेवा में निरंतर मानते हुए सभी सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाएं। साथ ही 1989 से सेवानिवृत्ति तक का वेतन-भत्ता तीन महीने में दिया जाए।