संसार के सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत में पितरों को देवता का भी देवता कहा गया है। इस प्रकार पितरों को चैतन्य माना गया है, जिन्हें अपनी संतति से कृतज्ञता की अपेक्षा रहती है।
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श्राद्ध इसी कृतज्ञता ज्ञापन का कर्मकांड है। श्राद्ध से संतुष्ट हुए पितृ अपनी संतान को तीन संपत्ति प्रदान करते हैं दीर्घायु, सुख एवं प्रतिष्ठा। महाभारत में कर्ण को श्राद्ध पक्ष में अन्न दान, वस्त्र दान का महत्व बताते हुए परम पिता ब्रह्माजी कहते हैं कि जहां श्राद्ध या पितृ पूजन हो वहां मौन रहना चाहिए। वाणी और शरीर को संयमित रखकर किया गया श्राद्ध ही फलदायक होता है। यह बात पंतनगर वार्ड में पितरों के निमित्त चल रही श्रीमद् भागवत कथा में कथा व्यास पं. रामकुमार मिश्रा महाराज ने कही।