Success Story: अमेरिका की ब्लूबेरी से लेकर देसी गिलोई तक…15 लाख की नौकरी छोड़ खेती से बनाई पहचान!

Success Story: अमेरिका की ब्लूबेरी से लेकर देसी गिलोई तक…15 लाख की नौकरी छोड़ खेती से बनाई पहचान!


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Abhay Shukla Success Story: सतना के अभय शुक्ला ने 15 लाख पैकेज वाली नौकरी छोड़ खेती को अपनाया. 150 एकड़ में 100 से ज्यादा फसलें उगाकर वैभव फार्म्स को जैव विविधता क्षेत्र में बदल दिया. उनकी कहानी नई पीढ़ी के लिए मिसाल है.

शिवांक द्विवेदी, सतना: मध्यप्रदेश के हाईटेक किसान अभय शुक्ला ने अपने जीवन की दिशा ही बदल दी है. 15 लाख सालाना पैकेज वाली नौकरी और आठ देशों में व्यापार का अनुभव छोड़कर खेती को ही अपनी नई पहचान बना लिया. उन्होंने अपनी मटेहना स्थित वैभव फार्म्स में 100 से ज़्यादा किस्मों की फसलें उगाई हैं और इसे जैव विविधता क्षेत्र का रूप दे दिया है. लोकल 18 से बातचीत में अभय ने बताया कि कोविड के समय उन्होंने महसूस किया कि कोई भी नौकरी स्थायी नहीं होती इसलिए खुद का काम करना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है.

पीढ़ियों से हो रही थी खेती
अभय का परिवार पीढ़ियों से खेती से जुड़ा है लेकिन शहर की आधुनिक जीवनशैली और कॉर्पोरेट नौकरी ने उन्हें अलग राह दिखाई थी. गाँव लौटकर उन्होंने अपने पिता से एक छोटी बगिया की अनुमति ली और वहीं से उनकी बड़ी यात्रा शुरू हुई. पहले तो गाँव के लोग यह विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि शहर से आए लोग खेती कर पाएंगे. लेकिन अभय ने मेहनत और योजना के दम पर इस चुनौती को स्वीकार किया और अपनी बगिया को जैविक खेती और विविध फसलों का केन्द्र बना दिया.

हर तरह के पेड़ हैं मौजूद 
उनकी बगिया में लाल चंदन, मोहागनी, सेव, मुस्समी, माल्टा, चीकू, लीची, मैंगोस्टीन, स्ट्रॉबेरी, टिंडर और शीशम के पेड़ हैं. इसके साथ ही औषधीय पौधों जैसे अश्वगंधा, इन्सुलिन, स्टेविया आदि भी उगाए जा रहे हैं. अभय ने बताया कि बचपन में जब उन्होंने इस जगह को देखा तो यहाँ ना तो बिजली थी, ना रास्ता, ना पानी था तो बस जंगली पेड़ और कीचड़. पिता ने कड़ी मेहनत की और ट्रैक्टर व जेसीबी की मदद से खेतों को समतल कराया गया और इन सबकी शुरुआत सिर्फ एक एकड़ जमीन से हुई थी. वर्तमान में वैभव 150 एकड़ से अधिक ज़मीन में खेती कर रहे हैं जिसमें 35 एकड़ उनकी अपनी है.

कैसे शुरू हुआ सफर 
तीन साल के भीतर अभय ने पूरी तरह जैविक खेती अपनाई. यहाँ अमेरिका की ब्लूबेरी से लेकर देसी गिलोह तक की विविध किस्में मौजूद हैं. उन्होंने अपने छोटे भाई को भी नोएडा से बुलाया और दोनों मिलकर इस बंजर ज़मीन का नक्शा बदल चुके हैं.

भविष्य में और बड़ी योजना 
भविष्य की योजना के बारे में अभय कहते हैं कि वे इस फार्म को बड़े स्तर पर ले जाकर रूरल टूरिज्म और इको टूरिज्म की दिशा में काम करना चाहते हैं. उन्होंने बताया कि गाँव में रहकर खेती करना हमेशा अच्छा लगता था लेकिन कोविड के बाद उन्होंने शहर छोड़कर खेती करने का निर्णय लिया. अभय को इस क्षेत्र में अंजीर, शहतूत और अमरूद का व्यवसाय भी आकर्षक लग रहा है. वहीं आम की बारा महीने फल देने वाली वेरायटी और मियाज़ाखी जैसी किस्मों में भी व्यापार की संभावना देख रहे हैं. भारत के सबसे बेहतरीन आम नूरजहाँ की किस्में भी उनके फार्म में लगी हैं.

अभय की कहानी यह दिखाती है कि मेहनत, योजना और जुनून से कोई भी व्यक्ति अपनी ज़िंदगी की दिशा बदल सकता है. शहर की नौकरी छोड़कर गाँव में खेती करना आसान नहीं लेकिन उनके प्रयास और परिवार की मदद से यह सपना अब वास्तविकता बन चुका है. आज यह फार्म न केवल खेती बल्कि जैव विविधता और ग्रामीण पर्यटन का भी उदाहरण बनता जा रहा है.

shweta singh

Shweta Singh, currently working with News18MPCG (Digital), has been crafting impactful stories in digital journalism for more than two years. From hyperlocal issues to politics, crime, astrology, and lifestyle,…और पढ़ें

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अमेरिका की ब्लूबेरी से लेकर गिलोई तक…15 लाख की नौकरी छोड़ खेती से बनाई पहचान



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