शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी पर मंगलवार सुबह उज्जैन में पारंपरिक रूप से शासकीय नगर पूजा होगी। इस दौरान कलेक्टर रौशन सिंह और प्रतिनिधि चौबीस खंबा माता मंदिर में महामाया और महालया माता को मदिरा का भोग लगाकर पारंपरिक पूजन करेंगे।
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इसके बाद कलेक्टर की अगुवाई में एक दर्जन से अधिक पटवारी, कोटवार सहित कई अधिकारी-कर्मचारी और श्रद्धालु सड़क पर मदिरा की धार लगाते हुए 27 किलोमीटर तक पैदल चलकर करीब 40 मंदिरों में पूजन-अर्चन करेंगे।
नगर पूजा की यह परंपरा राजा विक्रमादित्य के समय से चली आ रही है। इसके लिए आबकारी विभाग शराब की 31 बोतल नि:शुल्क राजस्व विभाग को उपलब्ध कराता है।
भैरव मंदिर में होगा समापन
सुबह 8 बजे चौबीस खंबा मंदिर में नगर पूजा की शुरुआत होगी, जो रात करीब 8 बजे हांडी फोड़ भैरव मंदिर पर समाप्त होगी। इस दौरान नगर के देवी, भैरव और हनुमान मंदिरों में पूजन-अर्चन होगी। नगर पूजा में माता से नगर की सुख-समृद्धि और प्राकृतिक प्रकोप से रक्षा की कामना की जाती है।
महाअष्टमी पर घरों में भी कुल देवी का पूजन किया जाता है। ढोल-नगाड़ों के साथ कलेक्टर माता को मदिरा अर्पित करेंगे। इस दौरान माता को सोलह श्रृंगार की सामग्री, चुनरी और बड़बाखल का भोग भी लगाया जाएगा। नगर पूजा के दौरान सुबह से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर में शामिल होंगे।
इसी दिन दोपहर 12 बजे हरसिद्धि मंदिर के गर्भगृह में भी माता को श्रृंगार सामग्री अर्पित कर शासकीय पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि मां को मदिरा का भोग लगाने से शहर में सुख-समृद्धि आती है।

27 किलोमीटर की यात्रा में 40 मंदिरों में पूजा
चौबीस खंबा मंदिर में माता महामाया और महालया की पूजा के बाद शासकीय दल नगर पूजा के लिए निकलता है। कोटवार मदिरा से भरी हांडी लेकर चलते हैं, इसकी धार नगर के रास्तों पर बहती है। ढोल के साथ निकले शासकीय दल के सदस्य 12 घंटे तक 27 किलोमीटर के दायरे में आने वाले चामुंडा माता, भूखी माता, काल भैरव, चंडमुंड नाशिनी सहित 40 देवी, भैरव और हनुमान मंदिरों में पूजा करते हैं।
देवी और भैरव को मदिरा का भोग लगाया जाता है। हनुमान मंदिरों में ध्वजा अर्पित की जाती है। करीब 8 बजे गढ़ कालिका माता मंदिर में पूजन के बाद हांडी फोड़ भैरव मंदिर में पूजा समाप्त होती है।
पटवारी की होती है जवाबदारी
- बूंद-बूंद कर 27 किमी तक शराब की धार लगाने की परंपरा के लिए करीब हफ्तेभर पहले एसडीएम दफ्तर से आबकारी विभाग को पत्र जारी किया जाता है।
- यह पत्र पटवारी द्वारा रेलवे स्टेशन स्थित आबकारी विभाग के कार्यालय पहुंचाया जाता है। यहां भंडार से आबकारी विभाग पूजन के लिए मुफ्त 31 बोतल देता है।
- शराब और बलबाकल का भोग लगाने और नगर पूजा की जवाबदारी पटवारी, कोटवार और एक वसूली पटेल के हाथों में होती है।
- राजस्व विभाग के सहयोग से होने वाली पूजा का कुल खर्च 18000 हजार रुपए आता है।
- करीब 20 साल पहले वसूली पटेल को यहीं से 18-20 बोतल शराब पूजन के लिए दी जाती थीं। पटवारी इन्हें 2 दिन पहले ही मंदिर में पहुंचा देते थे।
काले चने-गेहूं को उबालकर बनाते हैं बलबाकल का भोग
पूजन के लिए करीब 45 तरह का सामान दो दिन पहले लेकर रख लिया जाता है। एक दिन पहले चौबीस खंबा माता मंदिर के पास काले चने और गेहूं को उबालकर करीब 35 किलो बलबाकल तैयार करते हैं। इसके साथ ही माता को भोग के लिए पूरी-भजिया भी बनाए जाते हैं। अष्टमी के दिन सुबह 6 बजे पूरा सामान तैयार करके रख लिया जाता है।

यात्रा खत्म होते ही कपड़ा लेने के लिए भीड़ लगती है
नगर पूजा के दौरान सभी चालीस मंदिरों में एक लाल कपडे़ का उपयोग किया जाता है। इसमें सिंदूर और कुमकुम लगाकर सभी भैरव और माता मंदिरों में पूजन किया जाता है। जब यात्रा का समापन हांडी फोड़ भैरव मंदिर पर होता है, तब लाल कपड़े के छोटे-छोटे टुकड़े कर प्रसाद के रूप में भक्तों को बांटे जाते हैं। मान्यता है कि यह बच्चों को बुरी नजर से बचाने के लिए घर पर बांधे जाते हैं।
राजा विक्रमादित्य करते थे देवी और भैरव पूजन
नगर पूजा का इतिहास करीब हजार वर्ष पुराना बताया जाता है। कहा जाता है कि अवंतिका नगरी में सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल से ही चौबीस खंबा माता मंदिर में नगर पूजन की परंपरा चली आ रही है।
सम्राट विक्रमादित्य माता महालया और महामाया के साथ ही भैरव की पूजा करते थे, ताकि नगर में समृद्धि और खुशहाली बनी रहे और किसी बीमारी या प्राकृतिक प्रकोप का भय न रहे। इसी कारण नवरात्रि पर्व की महाअष्टमी पर माता और भैरव को भोग अर्पित किया जाता है।
मदिरा का भोग लगाने के बाद पूरे नगर में मदिरा की धार इसलिए भी लगाई जाती है कि अतृप्त आत्माएं तृप्त होकर नगर की रक्षा करें।

24 खंभों पर बना है मंदिर
प्राचीन देवी मंदिर के भीतर 24 काले पत्थरों के खंभे हैं, इसी कारण इसे चौबीस खंबा माता मंदिर कहा जाता है। यह उज्जैन नगर में प्रवेश करने का प्राचीन द्वार हुआ करता था और इसके चारों ओर परकोटा भी बना था।
तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध प्राचीन अवंतिका (उज्जैन) के चारों द्वारों पर भैरव और देवी विराजमान हैं, जो नगर को आपदा और विपदा से सुरक्षित रखते हैं। चौबीस खंबा माता उन्हीं में से एक हैं। यह मंदिर करीब 1000 साल पुराना बताया जाता है। मंदिर में लगे एक शिलालेख के अनुसार यहां कभी पशु बलि की प्रथा भी प्रचलित थी, लेकिन 12वीं शताब्दी में इसे समाप्त कर दिया गया।
इस मंदिर को चौबीस खंबा माता मंदिर कहे जाने का स्पष्ट कारण यह है कि प्रवेश द्वार दोनों ओर से 12-12 खंभों पर आधारित है। इन भव्य, आकर्षक और विशालकाय काले पत्थरों के कुल 24 खंभों की वजह से ही इसका नाम पड़ा।

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