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मप्र के परिवहन मंत्री राव उदयप्रताप सिंह ने ये बात 30 सितंबर को भोपाल आरटीओ में फेसलेस सुविधाओं का विस्तार करते हुए कही थी। पासपोर्ट ऑफिस की कार्यप्रणाली को लागू करने का सपना देख रहे मंत्री जी को शायद इस बात का अंदाजा ही नहीं है कि डिजिटल सेवाओं को भी आरटीओ के बाबू और अफसरों ने हाईजैक कर लिया है।
बाबू और अफसरों ने सरकारी खजाने को चूना लगाने और आम लोगों से वसूली के अनूठे तरीके ईजाद कर लिए हैं। भोपाल आरटीओ में एक दुकान नंबर 1 है जहां से ‘नंबर दो’ का काम होता है। बाबुओं ने इस दुकान में रिश्वत लेने का पूरा सिस्टम डेवलप किया है।
वहीं एक बस मालिक ने टैक्स की चोरी करने के लिए उज्जैन जाए बगैर ऑनलाइन तरीके से अपनी सीटों की संख्या कम कर ली, जबकि बस उज्जैन में रजिस्टर्ड भी नहीं है। कैसे संगठित तरीके से भ्रष्टाचार का ये पूरा खेल चल रहा है? भास्कर ने इसकी पड़ताल की। पढ़िए रिपोर्ट
केस-1: बस चलती रही भोपाल में, सीटें घट गईं उज्जैन में
यह कहानी है बस क्रमांक MP05 P 0387 की। हरदा निवासी पवन जायसवाल के नाम पर यह बस नर्मदापुरम RTO में रजिस्टर्ड है और इसका परमिट भोपाल से हरदा के बीच का है। RTO के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, यह एक 52-सीटर बस थी। इस हिसाब से बस का सालाना टैक्स 2 लाख 91 हजार रुपए बनता था।
बस मालिक ने टैक्स बचाने के लिए सीटों की संख्या कम करने की कोशिश की। उन्होंने पहले नर्मदापुरम RTO में आवेदन दिया, लेकिन नियमों के तहत जांच के बाद उनका आवेदन खारिज कर दिया गया। जब एक जिले में दाल नहीं गली, तो दूसरे जिले में जुगाड़ का ताना-बाना बुना गया।
ये 52 सीटर बस है, लेकिन दस्तावेजों में ये 38 सीटर हो गई है।
रात के अंधेरे में हुआ ‘ऑनलाइन’ खेल बस मालिक ने उज्जैन RTO में बैठे अधिकारियों से संपर्क साधा। 28 जुलाई 2023 को बस मालिक ने सीटों की संख्या कम करने के लिए ऑनलाइन आवेदन किया। इसके बाद परिवहन विभाग के अफसरों ने जो कारनामा किया वो शायद इससे पहले कभी नहीं हुआ। इसे तीन पॉइंट्स से समझिए…
- अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन: जिस बस का रजिस्ट्रेशन नर्मदापुरम में था, जिसका परमिट भोपाल-हरदा का था, और जो भौतिक रूप से कभी उज्जैन गई ही नहीं, उसकी फाइल को अवैध रूप से उज्जैन RTO में एक्सेस किया गया।
- रात 10 बजे खुली फाइल: 28 जुलाई की रात ठीक 10 बजे, जब सरकारी दफ्तर बंद हो जाते हैं, उज्जैन RTO के सिस्टम पर यह फाइल खोली गई।
- मिनटों में हुआ बदलाव: कुछ ही मिनटों के अंदर बस की सीटें 52 से घटाकर 38 कर दी गईं। बिना किसी भौतिक सत्यापन, बिना किसी जांच और बिना अधिकार क्षेत्र के, एक झटके में सरकारी रिकॉर्ड बदल दिया गया।
सरकार को सालाना 72 हजार का चूना इस मामले की शिकायत EOW और लोकायुक्त से करने वाले मंगल सिंह चौहान बताते हैं, ‘सीटें कम होते ही बस मालिक को हर महीने टैक्स में 6,000 रुपए की सीधी बचत होने लगी। इस तरह, इस एक बस से परिवहन विभाग को सालाना 72,000 रुपए का राजस्व घाटा हुआ। यह एक संगठित अपराध है। उज्जैन RTO ने अनधिकृत रूप से दूसरे जिले में रजिस्टर्ड बस की फाइल खोलकर यह बदलाव किया।

केस-2: भोपाल RTO में दुकान नंबर-1 से दो नंबरी काम
उज्जैन का मामला ‘डिजिटल’ भ्रष्टाचार का उदाहरण है, तो भोपाल RTO के बाबुओं ने वसूली का एक ‘फिजिकल’ और पारदर्शी मॉडल तैयार कर लिया है। कुछ समय पहले RTO कार्यालय के अंदर प्राइवेट एजेंट (जिन्हें ‘कटर’ कहा जाता है) रिश्वत लेते हुए कैमरे में कैद हो गए थे। इस किरकिरी से बचने के लिए अधिकारियों ने रिश्वत लेने की पूरी प्रक्रिया को ही ‘आउटसोर्स’ कर दिया है।
अब यह काम ऑफिस के अंदर नहीं, बल्कि RTO के ठीक सामने बनी दुकान नंबर 1 से संचालित हो रहा है। यह दुकान RTO खुलने के साथ खुलती है और RTO बंद होने के बाद यहां दिनभर की वसूली का हिसाब-किताब होता है।

ये दुकान नंबर 1 है जहां आरटीओ के बाबुओं के लिए रिश्वत इकट्ठा की जाती है।
ऐसे काम करता है रिश्वत का आउटसोर्स सिस्टम
- इशारा: RTO में काम लेकर आने वाले एजेंटों को संबंधित बाबू या अधिकारी इसी दुकान पर जाने का इशारा कर देते हैं।
- पेमेंट: एजेंट दुकान पर बैठे प्राइवेट ‘कटर’ को अपने काम (जैसे- ट्रांसफर, फिटनेस, परमिट) के बारे में बताता है। काम के हिसाब से तय रिश्वत की रकम ली जाती है।
- पर्ची का सबूत: पैसे जमा होते ही, कटर एक सादे कागज पर हाथ से एक पर्ची बनाता है। इस पर्ची पर एजेंट का नाम, गाड़ी नंबर, काम का प्रकार, ली गई राशि और संबंधित बाबू का नाम लिखा होता है।
- डिजिटल प्रूफ: यह पर्ची एजेंट को नहीं दी जाती। उसे सिर्फ अपने मोबाइल से उस पर्ची की फोटो खींचने की इजाजत होती है। असली पर्ची कटर अपने पास हिसाब के लिए रख लेता है।
- काम पूरा: फोटो खींचते ही यह संदेश संबंधित बाबू तक पहुंच जाता है कि ‘वजन’ रख दिया गया है, और बिना किसी सवाल-जवाब के फाइल आगे बढ़ जाती है।
खुफिया कैमरे में कैद हुए ‘कटर’ दैनिक भास्कर की टीम ने जब दुकान नंबर 1 पर नजर रखी, तो दिनभर एजेंटों का तांता लगा रहा। जो काम पहले ऑफिस के अंदर डर और शोर-शराबे के साथ होता था, वह अब बड़ी ही शांति और व्यवस्था के साथ बाहर हो रहा था। भास्कर रिपोर्टर खुफिया कैमरे के साथ इस दुकान के भीतर पहुंचा। यहां दस बाय दस के एक कमरे में दो लोग पर्चियां काटते हुए और इसके एवज में पैसे लेते हुए कैमरे में कैद हुए।
इनमें से एक हाथ से पर्ची बना रहा था और उसके एवज में पैसे ले रहा था। पर्ची बनाकर वह दराज में रख रहा था।

इस तरह से काटी जाती हैं पर्चियां
शाम को ही हो जाता है हिसाब- किताब आरटीओ के बाबू शाम को 5 बजे के बाद अपना काम समेटने लगते हैं। ये वो वक्त होता है जब कटर दुकान से बाहर निकलता है और आरटीओ में जाकर बाबुओं से मिलता है। भास्कर की टीम के सामने ही दुकान नंबर एक से कटर बाहर निकलते हुए कैमरे में कैद हुआ। इसके बाद वह आरटीओ दफ्तर में पहुंचा यहां बाबुओं से मिला। बाबुओं से मिलने के कुछ देर बाद वह घर चला गया।

रिश्वत की पर्चियों पर एजेंट और बाबुओं के नाम लिखे कटर जो पर्ची बनाते हैं उसे बाद में हिसाब किताब के बाद जला दिया जाता है, यानी सबूत खत्म कर दिया जाता है, लेकिन भास्कर के हाथ में ये पर्चियां लगीं। इन पर्चियों पर एजेंट और बाबुओं के नाम साफ-साफ लिखे थे।
- एक पर्ची पर एजेंट राहुल का नाम, ट्रांसफर केस के 200 रुपए और बाबू का नाम ‘वर्मा’ लिखा था।
- दूसरी पर्ची पर LMV ट्रांसफर के लिए 500 रुपए के जिक्र के साथ बाबू का नाम ‘संजय वर्मा जी’ लिखा था।
- एक अन्य पर्ची पर एजेंट मनीष राठौर से 200 रुपए लेने की एंट्री थी और बाबू का नाम ‘इमरान’ था।
- इसी तरह एक पर्ची पर बाबू के नाम के आगे ‘पाठक’ लिखा हुआ मिला।

‘RTO भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है’ इस मामले को उजागर करने वाले वकील और सामाजिक कार्यकर्ता एडवोकेट विशाल द्विवेदी कहते हैं, ‘भोपाल RTO भ्रष्टाचार का एक संगठित अड्डा बन चुका है। यहां हर काम के लिए ‘कटर’ नियुक्त हैं। हालात इतने खराब हैं कि इन मुख्य कटर्स ने भी अपने नीचे छोटे-छोटे कर्मचारी रख लिए हैं, जो एजेंटों से वसूली कर पर्चियां और पैसा मुख्य कटर तक पहुंचाते हैं और फिर यह हिसाब ऊपर अधिकारियों तक जाता है।’ इस मामले में भास्कर ने जब परिवहन विभाग के अफसरों से बात की तो उन्होंने जांच कर कार्रवाई का भरोसा दिया।
