हाईकोर्ट ग्वालियर की युगल पीठ ने ग्वालियर के डीडी नगर में प्रस्तावित 65 करोड़ अटल कुंज के टेंडर पर पुनर्विचार का आदेश दिया है। कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी करते हुए कहा कि निविदा प्रक्रिया का उद्देश्य सार्वजनिक हित एवं सार्वजनिक धन की स
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इसलिए बोली प्रक्रिया में पारदर्शिता, समान अवसर एवं लेवल प्लेइंग फील्ड सिद्धांत पूरी तरह लागू होना चाहिए। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि नियमों की ढाल लेकर मनमानी नहीं की जा सकती है। कोर्ट ने इस 65 करोड़ के टेंडर से अतिरिक्त आयुक्त को बाहर कर दिया है।
हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में सुनवाई के दौरान अदालत ने अतिरिक्त आयुक्त (हाउसिंग बोर्ड) द्वारा पारित उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत पहले से स्वीकृत टेंडर प्रक्रिया को बीच में रोककर नए सिरे से निविदा बुलाने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी स्वयं पहले वित्तीय बोली खोलने का निर्देश देते हैं। फिर कुछ ही दिनों में अपना रुख बदल देते हैं, तो यह संदेह उत्पन्न करने वाला आचरण प्रतीत होता है।
ऐसे समझिए पूरा मामला दरअसल, हाउसिंग बोर्ड डीडी नगर में 65 करोड़ की लागत से अटल कुंज का निर्माण कर रहा है। इसके टेंडर में अतिरिक्त आयुक्त बार-बार बदलाव कर रहे थे। इस मनमानी के खिलाफ प्रैगमैटिक इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
कंपनी की ओर से आरोप लगाया गया था कि तकनीकी और वित्तीय दोनों चरणों में उसका प्रस्ताव सर्वाधिक उपयुक्त (एलआई) पाया गया था। इसके बावजूद अतिरिक्त आयुक्त ने एक निरस्त बोलीदाता की आपत्ति के आधार पर पूरी प्रक्रिया को रद्द कर दिया।
रेसीडेंशियल कॉम्प्लेक्स बना रहा है हाउसिंग बोर्ड शहर के डीडी नगर में अटल कुंज के नाम से हाउसिंग बोर्ड रेसीडेंशियल कॉम्प्लेक्स का निर्माण कर रहा है। इसके टेंडर में बार-बार अधिकारी ने हस्तक्षेप किया और अपने पद का इस्तेमाल करते हुए टेंडर को उस कंपनी को दे दिया, जिसका रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। इस पर कोर्ट ने सख्ती की है।
पालिया कंस्ट्रक्शन का रिकॉर्ड सही नहीं
हाईकोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि मुख्य आपत्ति करने वाली कंपनी पालिया कंस्ट्रक्शन स्वयं तकनीकी मानकों पर खरी नहीं उतरती थी। कोर्ट ने आदेश दिया कि 50 करोड़ से अधिक के टेंडर को स्वीकृत व अस्वीकृत करने का अधिकार केवल बोर्ड द्वारा गठित ‘बिजनेस कमेटी’ के पास है, जिसमें अध्यक्ष, आवास आयुक्त आदि शामिल होते हैं।
ऐसे में अतिरिक्त आयुक्त द्वारा अपने स्तर पर लिया गया निर्णय स्पष्ट रूप से अधिकार क्षेत्र से बाहर और अवैध था। कोर्ट ने अतिरिक्त आयुक्त के आचरण पर गंभीर आपत्ति जताते हुए बोर्ड को निर्देश दिया कि आगे की प्रक्रिया में उन्हें किसी भी तरह से शामिल नहीं किया जाए। कोर्ट ने टेंडर रद्द करने के आदेश को रद्द कर दिया।