चित्रकूट का गधा मेला, फिल्मी नाम वाले गधों की लगी लाखों की बोली, पर खतरे में 300 साल पुरानी परंपरा, जानें क्यों

चित्रकूट का गधा मेला, फिल्मी नाम वाले गधों की लगी लाखों की बोली, पर खतरे में 300 साल पुरानी परंपरा, जानें क्यों


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Chitrakoot Gadha Mela: चित्रकूट का ऐतिहासिक गधा मेला इस बार फिर सुर्खियों में रहा. फिल्मी नामों वाले गधों पर लाखों की बोली लगी. मंदाकिनी तट पर लगा यह अनोखा मेला परंपरा और मनोरंजन का संगम बना. कई राज्यों से पहुंचे व्यापारी, खरीददार और दर्शक इस अनोखे नज़ारे के गवाह बने.

सतना जिले की धार्मिक नगरी चित्रकूट में मंदाकिनी तट पर मंगलवार को लगा तीन दिवसीय ऐतिहासिक गधा मेला इन दिनों खूब चर्चा में रहा. इस मेले में गधों को अनोखे फिल्मी नाम देकर नीलामी की गई. लोगों की भीड़ सिर्फ बोली लगाने नहीं, बल्कि इन फिल्मी नामों वाले गधों को देखने के लिए भी भारी भीड़ उमड़ी.

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बुधवार को मेले में सनी देओल नाम का गधा 1.05 लाख रुपये में बिका. इससे पहले शाहरुख नाम का गधा भी इसी कीमत पर बिक चुका था. वहीं लॉरेंस बिश्नोई नाम के खच्चर को कोई खरीदार नहीं मिला जिससे लोगों में चर्चा का माहौल बन गया.

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फिल्मी नामों की वजह से मेले का हर कोना आकर्षण का केंद्र बना रहा. यहां सलमान खान 90 हजार में बिका तो माधुरी, कैटरीना और चंपकलाल जैसे नामों के गधे भी बोली में शामिल रहे. अल्लू अर्जुन पुष्पा नाम का गधा तो खास चर्चा में रहा.

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चित्रकूट का यह ऐतिहासिक गधा मेला न केवल मध्य प्रदेश बल्कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों से भी व्यापारियों को आकर्षित करता है. खरीदे गए गधे और खच्चर निर्माण कार्य, ईंट भट्टों और परिवहन के लिए उपयोग किए जाते हैं.

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व्यापारियों ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि नगर परिषद की ओर से मेले में पानी और छाया जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं दी गई हैं. हर व्यापारी से 600 रुपये प्रति जानवर और 30 रुपये खूंटा शुल्क लिया गया फिर भी सुविधाएं नदारद रहीं.

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मेले में न तो पुलिस बल तैनात रहे और न ही होमगार्ड मौजूद थे. व्यापारियों ने चेतावनी दी है कि अगर प्रशासन ने जल्द ध्यान नहीं दिया तो यह साढ़े 300 साल पुरानी परंपरा धीरे धीरे खत्म हो सकती है. वहीं, लोग इसे सांस्कृतिक धरोहर के रूप में बचाए रखने की मांग कर रहे हैं.

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इतिहासकार बताते हैं कि इस मेले की शुरुआत लगभग 1670 में मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल में हुई थी. जब उसकी सेना के घोड़े बीमार पड़ गए तब उसने गधों की खरीद के आदेश दिए और यहीं से यह मेला परंपरा के रूप में शुरू हुआ.

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राजस्थान के पुष्कर मेले के बाद चित्रकूट का यह गधा मेला देश का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता है. तीन दिन तक चलने वाला यह आयोजन न सिर्फ व्यापारिक लेन-देन का केंद्र है बल्कि ग्रामीण संस्कृति और परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है.

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चित्रकूट का गधा मेला, फिल्मी नाम वालो की लगी लाखों की बोली, पर खतरे में परंपरा



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