2012 से 2025, कोहली को कोहिनूर बनाने में कंगारूओं का रोल

2012 से 2025, कोहली को कोहिनूर बनाने में कंगारूओं का रोल


नई दिल्ली. ऑस्ट्रेलिया ही वह देश है जहां विराट कोहली ने एक सर्वकालिक दिग्गज बनने की दिशा में अपने पहले कदम रखे थे अब जब वह उस देश में अपना आखिरी मैच खेल चुके हैं, अब  ये देखना दिलचस्प है कि 2027 तक अपने सफर को जारी रखने के लिए सिडनी की ये पारी कितना टानिक का काम कर पाती है. सिडनी क्रिकेट ग्राउंड पर, वह ऑस्ट्रेलियाई मिट्टी पर आखिरी बार उतरे और रन भी बनाया . यही वह देश है जिसने कोहली की गाथा में कई सुनहरे अध्याय जोड़े हैं. शायद इसी वजह से चाहत है कि वो ऑस्ट्रेलिया दौरे पर गए और अंतिम मैच में अपनी एक छाप छोड़ी.

2012 में विराट ने पहली ऑस्ट्रेलिया यात्रा थी, और शुरुआती कुछ मैचों में विराट कोहली पूरी तरह असहज नज़र आ रहे थे. पर्थ में, ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी जैसा कि वे अक्सर करते हैं उनके नर्व पर चढ़ गए थे. दर्शकों की हूटिंग से परेशान होकर कोहली ने एक बार एक शोरगुल वाले हिस्से की तरफ बीच की उंगली दिखा दी थी, जब उन्हें ‘वैंकर’ कहा गया था. यह गुस्सा और उसे संभालने में कमी उनके शुरुआती करियर की पहचान थी, और कई लोगों को डर था कि यह उनके प्रतिभा के पूर्ण खिलने में बाधा बन सकता है. 

विराट को ऑस्ट्रेलिया ने बनाया और बचाया

विराट भले ही ऑस्ट्रेलिया से इंग्लैंड पहुंच चुके हो पर वो इस दौरे को 2012 के दौरे की तरह ही याद रखेंगे क्योंकि तब वो किंग कोहली का पहला दौरा था. तब जैसा अनुभव विराट ने किया  कुछ वैसा ही अनुभव 1989 में पाकिस्तान में सचिन तेंदुलकर ने भी किया था. शुरुआती दो मैचों में वह खुद को पूरी तरह असहज महसूस कर रहे थे. कोहली के लिए भी ऑस्ट्रेलिया में शुरुआत वैसी ही रही थी. वह वहां की पिच की उछाल और गति को समझ नहीं पा रहे थे, और पर्थ टेस्ट से पहले आत्मविश्वास डगमगा गया था लेकिन वही WACA मैदान उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. ऑस्ट्रेलिया के बेहतरीन पेस अटैक के खिलाफ 75 रनों की जुझारू पारी ने उन्हें एहसास कराया कि वह इस स्तर के खिलाड़ी हैं और अगला टेस्ट एडिलेड में  शतक लगाकर उन्होंने दुनिया को बता दिया कि अब वह रुकने वाले नहीं हैं. 

सिडनी से आगे सफर आसान नहीं 

अब कहानी कुछ अलग है एडिलेड से वह बिना खाता खोले लौटेलगातार दो बार शून्य पर आउट फिर आया सिडनी जहां खुद को साबित करने और यह दिखाने का कि अब भी उनके अंदर कितना दम है उन्होंने खेली 73 रनों की नाबाद पारी . यह उनके करियर का अंत नहीं, बल्कि एक पड़ाव है. अब क्रिकेट जानकार बोलने लगे है कि उन्हें आगे भी खेलने के मौके मिलने चाहिए कम से कम नौ और मैच (ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और न्यूज़ीलैंड में) उसके बाद ही किसी निर्णय की बात होनी चाहिए. इसमें कोई दो राय नहीं कि उनके खेल में कुछ कमजोरियां दिखने लगी हैं. ऑफ स्टंप के बाहर गेंदों पर उनकी दिक्कत अब जगजाहिर है. कुछ गेंदें वहां डालने के बाद गेंदबाज़ अब अंदर आती गेंद से उन्हें एलबीडब्ल्यू करने का जाल बिछाते हैं जैसा एडिलेड में हुआ लेकिन फिर भी, वह विराट कोहली हैं एक गर्वीला दिग्गज, जो दबाव झेलना जानता है

एकदिवसीय क्रिकेट में कोहली को अब तक का सबसे महान बल्लेबाज़ कहना अतिशयोक्ति नहीं है यह जानते हुए भी कि उनसे पहले एक सचिन तेंदुलकर खेल चुके हैं. जो भी हो, आज के समय में सब चाहते हैं कि वह अच्छा खेलें. वह विदाई का हाथ हिलाएं मगर दर्द और निराशा से नहीं, बल्कि बल्ला उठाकर, दर्शकों की तालियों में नहाकर यही है विराट कोहली, जिसे हम जानते हैं और यही तस्वीर हम चाहते हैं .



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