बाल दिवस यानी बच्चों का दिन एक ऐसा दिन जब देशभर में बच्चों की खुशियां मनाई जाती हैं, स्कूलों में कार्यक्रम होते हैं, और उन्हें नई उमंगों के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा दी जाती है. लेकिन इसी देश के एक हिस्से में कुछ बच्चे ऐसे भी हैं, जिनके हिस्से में न स्कूल आया, न किताबें बल्कि आईं सिर्फ सड़कें, भूख और बेबसी. ये बच्चे हर दिन सड़कों पर घूमते, भीख मांगते या कूड़े में से कुछ खाने की चीज़ें ढूंढते नजर आते हैं.
मध्य प्रदेश के खंडवा शहर में नवचंडी मंदिर के ग्राउंड के सामने झोपड़ियों की एक छोटी सी बस्ती है. यहां मिट्टी, लकड़ी और तिरपाल से बनी कुछ झोपड़ियों में गरीब परिवार रहते हैं. इन्हीं झोपड़ियों में पिछले 25 साल से रह रहे हैं तोताराम पवार, जो बंजार समुदाय से हैं. तोताराम का परिवार गरीबी और सरकारी उदासीनता की तस्वीर पेश करता है. उनके साथ उनकी बहू रुक्मणी और दो पोतियां पांच साल की वंशिका और चार साल की अंकिता रहती हैं.
रुक्मणी बताती हैं कि हम चाहते हैं कि हमारी बेटियां पढ़-लिखकर कुछ बनें. लेकिन बिना आधार कार्ड के सरकारी स्कूल में एडमिशन नहीं हो रहा. तीन बार स्कूल गई, मगर हर बार यही कहा गया पहले आधार कार्ड बनवाओ. रुक्मणी कहती हैं कि उन्होंने कई बार आधार कार्ड बनवाने की कोशिश की, लेकिन हर जगह टाल दिया गया. अगर आधार कार्ड बन जाए, तो मैं अपनी बेटियों को स्कूल भेज दूं. वो पढ़ेंगी, आगे चलकर मेडम बनेंगी, और हमारे जैसे गरीब बच्चों को पढ़ाएंगी यही मेरा सपना है. रुक्मणी की आंखों में उम्मीद की चमक नजर आती है, लेकिन हालात उस सपने को बार-बार धुंधला कर देते हैं.
रुक्मणी आगे बताती हैं कि न उन्हें किसी सरकारी योजना का लाभ मिलता है, न राशन कार्ड है, न ही पक्का घर. “बरसात के समय यह झोपड़ी गल जाती है, तो एक पलंग पर चार लोग तिरपाल डालकर सोते हैं. यही हमारा घर है, यही हमारी जिंदगी. अगर हमारे बच्चे पढ़ जाएंगे तो शायद हमारी हालत सुधर जाए.
जब Local 18 की टीम ने ग्राउंड पर पहुंचकर देखा, तो झोपड़ी के बाहर छोटे बच्चे मिट्टी में बैठे कुछ खाने की कोशिश कर रहे थे. वे मुस्कुराते तो हैं, लेकिन उनकी आंखों में सवाल झलकते हैं “ हम स्कूल क्यों नहीं जा सकते?” बच्चे फटे कपड़ों में थे, लेकिन उनकी मासूमियत अब भी ज़िंदा थी.
यह कहानी सिर्फ वंशिका और अंकिता की नहीं है, बल्कि उन सैकड़ों बच्चों की है जो गरीबी और व्यवस्था की खामियों के कारण शिक्षा से वंचित हैं. सरकारी योजनाएं कागजों पर हैं, लेकिन इन सड़कों पर कोई उनका हाल देखने नहीं आता. बाल दिवस के दिन जब स्कूलों में मिठाइयां बांटी जाती हैं, ये बच्चे किसी राहगीर के फेंके हुए खाने पर अपनी भूख मिटाते हैं.
खंडवा शहर के सामाजिक कार्यकर्ता अशोक बडोले कहते हैं कि यह बहुत दुखद है कि आज भी हमारे शहर में ऐसे परिवार हैं जिनके बच्चों को शिक्षा नहीं मिल पा रही. प्रशासन को ऐसे परिवारों की पहचान कर तत्काल आधार कार्ड बनवाने, राशन कार्ड जारी करने और बच्चों को स्कूल से जोड़ने की जरूरत है.
भारत में हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार (Right to Education) मिला हुआ है. लेकिन जब किसी बच्चे के पास जन्म प्रमाणपत्र या आधार कार्ड ही नहीं होता, तो उसका नाम स्कूल की सूची में शामिल नहीं हो पाता. यही दस्तावेज़ की दीवार वंशिका और अंकिता जैसे बच्चों के सपनों को रोक देती है.
रुक्मणी कहती हैं कि हम हर दिन मजदूरी करते हैं ताकि बच्चों को दो वक्त का खाना दे सकें. लेकिन हमें कोई देखने वाला नहीं. कभी कोई अधिकारी यहां नहीं आया. हम भी चाहते हैं कि हमारे बच्चे ‘बाल दिवस’ मनाएं, स्कूल जाएं, यूनिफॉर्म पहनें… लेकिन अभी तो सड़क ही इनका स्कूल है.”
सूरज ढलता है, झोपड़ी के बाहर बच्चे फिर से मिट्टी में खेलना शुरू करते हैं. न कोई किताब, न कॉपी, बस जीवन की सच्चाई को हर दिन जीना यही इनका ‘सिलेबस’ है. बाल दिवस पर जब देशभर में बच्चों की हंसी गूंज रही होती है, खंडवा की इन झोपड़ियों में बस एक ही आवाज़ गूंजती है “काश, हम भी स्कूल जा पाते…”