‘लव जिहाद’ पर हंगामा-गिरफ्तारी, कोर्ट से 90% आरोपी बरी: 5 साल में 283 केस, सजा सिर्फ सात को; केस न टिकने की 6 वजह – Madhya Pradesh News

‘लव जिहाद’ पर हंगामा-गिरफ्तारी, कोर्ट से 90% आरोपी बरी:  5 साल में 283 केस, सजा सिर्फ सात को; केस न टिकने की 6 वजह – Madhya Pradesh News


एमपी में एक बार फिर कथित लव जिहाद के मामले सुर्खियों में है। पिछले पंद्रह दिनों में चार मामले सामने आए हैं। इनमें से दो इंदौर और एक भोपाल और एक खंडवा का है। इंदौर के दो मामलों में से एक में युवती की शिकायत पर आरोपी इरफान अली के खिलाफ केस दर्ज हो गया

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वहीं भोपाल में मॉडल की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद उसके मुस्लिम बॉयफ्रेंड कासिम के खिलाफ कथित लव जिहाद यानी धार्मिक स्वातंत्र्य अधिनियम 2021 की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। खंडवा में एक युवती की शिकायत पर दो युवकों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ है।

आगे की प्रोसेस में पुलिस इन मामलों की जांच करेगी और समय सीमा के भीतर कोर्ट में चालान पेश किया जाएगा। लव जिहाद के मामलों को लेकर खास बात ये है कि इन्हें लेकर जितना राजनीतिक और सामाजिक बवाल मचता है, कानून की चौखट पर इनके पहुंचते ही कहानी बदल जाती है। पिछले पांच साल के आंकड़े देखें तो 283 मामलों में से 7 मामलों में ही आरोपियों को सजा हुई हैं।

भास्कर ने ऐसे ही मामलों की पड़ताल की जिसमें आरोपियों को अदालत ने रिहा कर दिया। उसकी वजह क्या रही? इसे लेकर कानून के जानकारों से भी बात की। पढ़िए रिपोर्ट

तीनों केस को सिलसिलेवार समझिए

केस1: मॉडल की मौत और लिव-इन पार्टनर पर ‘लव जिहाद’ का केस 11 नवंबर को भोपाल में मॉडलिंग करने वाली खुशबू अहिरवार की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। खुशबू, कासिम नाम के एक युवक के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही थी। प्राथमिक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत का कारण प्रेग्नेंसी से जुड़ी जटिलताओं को बताया गया है। लेकिन खुशबू की मां ने कासिम पर हत्या और ‘लव जिहाद’ का गंभीर आरोप लगाते हुए केस दर्ज कराया है।

उनका आरोप है कि कासिम ने पहचान छिपाकर और धर्म परिवर्तन का दबाव बनाकर उनकी बेटी को फंसाया। पुलिस ने कासिम को गिरफ्तार कर धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया है। वहीं, कासिम ने पूछताछ में बताया है कि वह और खुशबू दो साल से साथ थे, बच्चा उसी का था और वे जल्द ही शादी करने की योजना बना रहे थे।

मॉडल खुशबू को अस्पताल में भर्ती करने के लिए ले जाता बॉयफ्रेंड कासिम।

मॉडल खुशबू को अस्पताल में भर्ती करने के लिए ले जाता बॉयफ्रेंड कासिम।

केस2: रेप, ब्लैकमेल और धर्म परिवर्तन का दबाव इंदौर में 10-11 नवंबर को एक और सनसनीखेज मामला सामने आया। राजस्थान की एक युवती ने इरफान अली उर्फ हैप्पी पंजाबी के खिलाफ रेप, ब्लैकमेलिंग, मारपीट और धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज कराई। पीड़िता ने आरोप लगाया है कि इरफान ने न केवल खुद उसके साथ बार-बार रेप किया, बल्कि अपने दोस्त से भी रेप करवाया।

उसे जबरन मवेशी का मीट खिलाया गया और धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया। युवती का गर्भपात भी कराया गया। आरोपी इरफान अली देवास का एक कुख्यात अपराधी है, जिसे जिलाबदर भी किया जा चुका है और उसके खिलाफ 16 आपराधिक मामले दर्ज हैं।

हैप्पी पंजाबी के खिलाफ रेप, ब्लैकमेलिंग का मामला दर्ज किया है।

हैप्पी पंजाबी के खिलाफ रेप, ब्लैकमेलिंग का मामला दर्ज किया है।

केस3: जिम ट्रेनर की पिटाई और युवती का FIR से इनकार एक अन्य घटना में, इंदौर में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने ‘लव जिहाद’ के शक में शादाब नामक एक जिम ट्रेनर की पिटाई कर दी और उसे पुलिस के हवाले कर दिया। कार्यकर्ताओं का आरोप था कि शादाब शादीशुदा और दो बच्चों का पिता होने के बावजूद अपनी पहचान छिपाकर जिम में आने वाली युवतियों को प्रेम जाल में फंसाता है।

हालांकि, इस मामले में जब पुलिस ने युवती से संपर्क किया, तो उसने किसी भी तरह की एफआईआर दर्ज कराने से साफ इनकार कर दिया। ये तीनों मामले इस मुद्दे के अलग-अलग पहलुओं को उजागर करते हैं—एक में मौत के बाद परिवार का गंभीर आरोप है, दूसरे में एक अपराधी द्वारा गंभीर शोषण का मामला है, और तीसरे में एक संगठन की कार्रवाई है लेकिन पीड़िता शिकायत करने को तैयार नहीं है।

जिम ट्रेनर शादाब की बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पिटाई की, हालांकि युवती ने एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया।

जिम ट्रेनर शादाब की बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पिटाई की, हालांकि युवती ने एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया।

90 फीसदी मामलों में आरोपी बरी एमपी में ‘लव जिहाद’ के जितने मामले दर्ज होते हैं उनमें आरोपियों को उस अनुपात में सजा नहीं मिल पाती। विधानसभा में पेश आंकडे इस सच्चाई को बयां करते हैं। एक सवाल के जवाब में सरकार ने बताया कि जनवरी 2020 से 15 जुलाई 2025 (संभावित रिकॉर्डेड डेट) तक मध्य प्रदेश में कथित ‘लव जिहाद’ के कुल 283 मामले मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 2021 के तहत दर्ज किए गए।

इनमें सबसे ज्यादा 74 मामले इंदौर और भोपाल में 33 मामले दर्ज हुए, जो राज्य के कुल मामलों का करीब 40 फीसदी है। इसके बाद खंडवा और उज्जैन में 12-12 और छतरपुर में 11 मामले दर्ज किए गए हैं। कुल 283 मामलों में से 197 मामले अभी भी विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। केवल 86 मामलों में पुलिस जांच पूरी कर फैसला सुनाया जा सका है।

इनमें से 50 मामलों में आरोपी बरी हो गए। सजा सिर्फ 7 मामलों में हुई है। बाकी मामले या तो खारिज हो गए या उनमें समझौता हो गया।

अब जानिए अदालतों में क्यों दम तोड़ देते हैं ‘लव जिहाद’ के मामले? इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने दो पुराने मामलों का विश्लेषण किया, जो अदालती प्रक्रिया में इन केसों के कमजोर पड़ने की वजह को उजागर करते हैं।

केस-1: जब पीड़िता और गवाह ही मुकर गए

घटना: 26 अगस्त, 2021 को खंडवा के मूंदी थाना क्षेत्र में 12वीं की एक छात्रा ने सलमान खान नाम के युवक पर धर्म परिवर्तन और निकाह के लिए दबाव बनाने का आरोप लगाया। उसने कहा कि सलमान उसे परेशान करता है और धर्म न बदलने पर जान से मारने की धमकी देता है। पुलिस ने IPC की विभिन्न धाराओं के साथ धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत केस दर्ज किया।

कोर्ट में क्या हुआ: इस मामले में पीड़िता, उसकी मां और भाई मुख्य गवाह थे। लेकिन अदालत में सुनवाई के दौरान तीनों अपने बयानों से पलट गए। पीड़िता ने कहा कि वह सलमान को जानती है, लेकिन उसने कोई छेड़छाड़ या जबरदस्ती नहीं की थी, शिकायत पुलिस के दबाव में दी थी। मां और भाई ने भी अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया।

केस2: जब पत्नी ने हिंदू पति पर ही लगाया ‘लव जिहाद’ का केस

घटना: 16 दिसंबर, 2023 को राजगढ़ के जीरापुर में एक महिला ने अपने पति दिलीप खटिक पर ही ‘लव जिहाद’ का केस दर्ज करा दिया। महिला का आरोप था कि 2004 में हिंदू रीति-रिवाज से शादी करने वाले उसके पति ने किसी के प्रभाव में आकर धर्मांतरण कर लिया है और अब उस पर और बेटे पर भी धर्म बदलने का दबाव डाल रहा है, नमाज पढ़ने और रोजा रखने को मजबूर कर रहा है।

पुलिस की कार्रवाई: पुलिस ने धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत FIR दर्ज कर दिलीप को गिरफ्तार कर लिया।

कोर्ट में स्थिति: दिलीप दो हफ्ते बाद जमानत पर रिहा हो गया। लेकिन इस मामले में महीनों बीत जाने के बाद भी पुलिस अब तक कोर्ट में चालान (चार्जशीट) पेश नहीं कर पाई है। वहीं, दिलीप का आरोप है कि पत्नी ने अपने अवैध संबंधों को छिपाने के लिए उस पर झूठा केस लगाया है। यह मामला पुलिस जांच के स्तर पर ही कमजोर नजर आ रहा है।

‘लव जिहाद’ के मामलों के अदालत में टिक न पाने की वजहों को समझने के लिए हमने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और जिला अदालतों के वरिष्ठ वकीलों और एक पूर्व आईपीएस अधिकारी से बात की। उन्होंने इसके पीछे 6 मुख्य वजहें बताईं:

1. गवाहों का पलटना यह सबसे आम और बड़ी वजह है। कई मामलों में, शिकायत दर्ज कराने वाली पीड़िता या उसके परिजन कोर्ट में जाकर अपने बयान बदल देते हैं। वे कह देते हैं कि शिकायत गुस्से में, सामाजिक दबाव में या पुलिस के कहने पर की थी। जब मुख्य गवाह ही मुकर जाए, तो अभियोजन का केस स्वतः ही ढह जाता है। सीनियर एडवोकेट धीरज तिवारी कहते हैं कि कुछ केस धार्मिक संगठनों के दबाव में शक के आधार पर दर्ज हो जाते हैं, लेकिन आरोपी के खिलाफ ठोस सबूत नहीं मिलते।

2. ठोस सबूतों की कमी धोखा, दबाव या जबरन धर्म परिवर्तन साबित करने के लिए ठोस सबूत चाहिए होते हैं। ज्यादातर मामलों में पुलिस या अभियोजन पक्ष कोई डिजिटल साक्ष्य (जैसे चैट, कॉल रिकॉर्ड, वीडियो), बैंक ट्रांजैक्शन या कोई दस्तावेजी प्रमाण पेश नहीं कर पाता, जो आरोपी के इरादे को साबित कर सके।

3. कमजोर पुलिस जांच कई बार जांच अधिकारी तकनीकी साक्ष्य जुटाने में लापरवाही करते हैं। कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), मोबाइल की फोरेंसिक जांच या सोशल मीडिया प्रोफाइल का विश्लेषण ठीक से नहीं किया जाता। अधूरी जांच और कमजोर चार्जशीट के कारण बचाव पक्ष को फायदा मिलता है।

4. सामाजिक या राजनीतिक दबाव में दर्ज FIR कई मामले ठोस अपराध के बजाय किसी धार्मिक संगठन, परिवार या समाज के दबाव में दर्ज कराए जाते हैं। बाद में जांच में पता चलता है कि रिश्ता आपसी सहमति से था, जिसके बाद मामला कानूनी रूप से कमजोर पड़ जाता है।

5.युवक-युवती की सहमति यदि लड़का और लड़की दोनों बालिग (18 वर्ष से अधिक) हैं और रिश्ता उनकी आपसी सहमति से बना है, तो यह कानूनन अपराध नहीं है। भारत का संविधान (अनुच्छेद 21) हर वयस्क को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार देता है। ऐसे मामलों में धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम लागू नहीं होता।

रिटायर्ड आईपीएस एन के त्रिपाठी कहते हैं कि भारत का संविधान दो वयस्कों को साथ रहने की पूरी स्वतंत्रता देता है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति छलकपट या पहचान छिपाकर किसी को धोखे में रखे या शादी के लिए मजबूर करे, तो यह अपराध है।

6. धर्म परिवर्तन का ‘स्पष्ट प्रमाण’ न होना इस कानून के तहत यह साबित करना जरूरी है कि धर्म परिवर्तन के लिए “दबाव” डाला गया या “धोखा” दिया गया। अधिकतर मामलों में न तो धर्म परिवर्तन की कोई औपचारिक प्रक्रिया (जैसे किसी धार्मिक संस्था से प्रमाण पत्र) हुई होती है और न ही दबाव का कोई सीधा सबूत मिलता है। जिला न्यायालय के एडवोकेट वाहिद खान कहते हैं कि कई बार रिश्ते सहमति से होते हैं, पर परिजनों या संगठनों के दबाव में केस दर्ज हो जाता है। अदालत में ऐसे मामले उल्टे पड़ जाते हैं और कोर्ट बालिग युवक-युवती को साथ रहने की अनुमति दे देता है।”



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