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डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय में जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में भगवान बिरसा मुंडा के जीवन दर्शन, संघर्ष और उनके सामाजिक पुनर्जागरण की चर्चा हुई। कार्यक्रम संयोजक प्रो. केशव टेकाम ने कहा कि मानव विकास प्रकृति-पोषित होना चाहिए, न कि प्रकृति-शोषित। बिरसा मुंडा का आंदोलन केवल अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह नहीं था, बल्कि जनजातीय समाज की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने का संघर्ष था।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. वायएस ठाकुर ने कहा कि बिरसा मुंडा ने सामाजिक कुरीतियों, अत्याचार और शराबखोरी के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया। उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे मोबाइल का उपयोग केवल आवश्यक कार्यों तक सीमित रखें। मुख्य अतिथि देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के प्रो. सखाराम मुजाल्दे ने कहा कि 25 वर्ष की अल्पायु में अद्वितीय नेतृत्व और बलिदान के कारण बिरसा मुंडा ऐसे एकमात्र शहीद हैं, जिन्हें भगवान की उपाधि मिली। उन्होंने विश्वविद्यालय में जनजातीय अध्ययन केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव रखा।
प्रो. डीके नेमा ने कहा कि उद्देश्य और आचरण ही किसी महान व्यक्तित्व को जन्म देते हैं। प्रो. अजीत जायसवाल ने शिक्षा को अन्याय के खिलाफ संघर्ष का सबसे प्रभावी साधन बताया। कुलसचिव डॉ. एसपी उपाध्याय ने प्रकृति संरक्षण की आवश्यकता पर जोर देते हुए जनजातीय अध्ययन केंद्र की स्थापना के लिए पहल करने की घोषणा की।