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MP Gupt Kashi: कहते हैं कि मध्य प्रदेश में नर्मदा के तट पर बसे इस प्राचीन शहर में काशी विश्वनाथ विराजमान हैं. बताया जाता है कि यहां से शिवलिंग वाराणसी जाना था, लेकिन समय से नहीं पहुंच पाने के कारण शिवलिंग को यहीं स्थापित कर दिया गया. जानें रोचक बात…
Khargone News: मध्य प्रदेश के खरगोन में मां नर्मदा नदी के पावन तट पर बसा महेश्वर अपनी ऐतिहासिक विरासत, भव्य किलों, प्राचीन मंदिरों, माहेश्वरी साड़ियों और अद्भुत नक्काशी के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है. देश-विदेश से यहां पर्यटक ओर श्रद्धालु आते हैं. भगवान कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन और देवी अहिल्या बाई होलकर के गौरवशाली इतिहास रूबरू होते हैं. लेकिन, बहुत कम लोग जानते हैं कि महेश्वर को गुप्त काशी कहा जाता है. मान्यता है कि वाराणसी में स्थापित होने वाला शिवलिंग समय पर नहीं पहुंच पाने के अभाव में महेश्वर में ही गुप्त काशी के नाम से स्थापित हुआ.
यहां का काशी विश्वनाथ मंदिर अपनी बनावट और गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग के कारण वाराणसी के मंदिर से हूबहू मेल खाता है. मान्यता के अनुसार, यह शिवलिंग नर्मदा से प्रकट हुआ था. एक शुभ मुहूर्त में काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित होना था, लेकिन समय से पहुंच नहीं पाया. ऐसे में महेश्वर में ही भव्य मंदिर बनाकर इसकी विधिवत स्थापना करके गुप्त काशी नाम दिया गया. बाद में वर्ष 1786 में देवी अहिल्या बाई होलकर ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया. इसी तरह 1780 में उन्होंने वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण भी कराया था. दोनों मंदिरों की संरचना में मराठा शैली की एक जैसी छाप साफ नजर आती है.
हर साल लाखों श्रद्धालु करते हैं दर्शन
गौरतलब है कि वाराणसी में गंगा तट पर स्थित काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग का महत्व पूरी दुनिया जानती है, जबकि महेश्वर का यह मंदिर भी धार्मिक मान्यताओं में उतना ही प्रभाव रखता है. नर्मदा तट पर स्थित होने के कारण इसकी पवित्रता और बढ़ जाती है. श्रद्धालु मानते हैं कि जो लोग किसी कारणवश ज्योतिर्लिंग के दर्शन हेतु वाराणसी नहीं पहुंच पाते, वे महेश्वर आकर वही आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त कर सकते हैं. इसी वजह से महेश्वर को “मध्य प्रदेश की गुप्त काशी” कहा जाता है.
वास्तुशास्त्र के अनुसार बना है मंदिर
महेश्वर किला परिसर में बने इस मंदिर की संरचना पूरी तरह वास्तुशास्त्र के अनुरूप है. मुख्य द्वार पर नवग्रहों की प्रतिमाएं स्थापित हैं, जबकि अंदर प्रवेश करते ही पंचदेव “सूर्य, गणेश, विष्णु, मां जगदंबा और गरुड़” का दर्शन होता है. सभा मंडप में भगवान कृष्ण की रासलीला की आकर्षक नक्काशी की गई है. गर्भगृह में शिव पंचायत के साथ नाग, नंदी, कछुआ और अन्य पौराणिक प्रतीक मौजूद हैं. यहां स्थापित शिवलिंग के बारे में माना जाता है कि यह नर्मदा नदी से प्रकट हुआ था, इसलिए इसकी दिव्यता बढ़ जाती है.
वाराणसी जितना पुराना मंदिर
मंदिर के निर्माण को लेकर अलग-अलग कथाएं मिलती हैं. कुछ इसे अहिल्या बाई का निर्माण मानते हैं, जबकि कुछ इतिहासकार इसे इससे भी पुराना बताते हैं. मंदिर से जुड़े आलोक पुरोहित ओर हेमंत जैन के अनुसार, कई सदियों पहले जब बनारसी का काशी विश्वनाथ मंदिर बना उसी के काल में वामन नाम के राजा ने इसका निर्माण करवाया था. बाद में अहिल्या बाई ने इसका जीर्णोद्धार करवाया. देवी अहिल्या बाई स्वयं यहां पूजा-अर्चना के लिए आती थीं.
एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय. प्रिंट मीडिया से शुरुआत. साल 2023 से न्यूज 18 हिंदी के साथ डिजिटल सफर की शुरुआत. न्यूज 18 के पहले दैनिक जागरण, अमर उजाला में रिपोर्टिंग और डेस्क पर कार्य का अनुभव. म…और पढ़ें
एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय. प्रिंट मीडिया से शुरुआत. साल 2023 से न्यूज 18 हिंदी के साथ डिजिटल सफर की शुरुआत. न्यूज 18 के पहले दैनिक जागरण, अमर उजाला में रिपोर्टिंग और डेस्क पर कार्य का अनुभव. म… और पढ़ें