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Balaghat News : प्राचीन काल से ही मुर्गा लड़ाई का चलन रहा है. मनोरंजन के लिए लोग ये खेल खेलते थे. पालनाडु युद्ध यानी 1178-82 का परिणाम भी मुर्गे की लड़ाई से तय हुआ था. इसके बाद ये प्रथा शुरु हुई. आज के समय आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में ये खूनी खेल चलता है.
मुर्गा लड़ाई के बारे में आपने तो सुना ही होगा. अब बहुत सी जगहों पर वह विलुप्त हो गई है. वहीं, सरकार ने भी इसे प्रतिबंधित करवा दिया है. बावजूद इसके लोगों में मुर्गा लड़ाई के प्रति लोगों की दीवानगी आज भी देखी जाती है, जिसमें लोग आज भी चोरी छिपे इस खूनी खेल आज भी होता है. दो मुर्गों के खूनी संघर्ष में एक मुर्गे को अपनी कुर्बानी देनी होती है. इसी के साथ ये खेल शुरु होता है. ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि वह खेल कैसे चलता है और उसके लिए मुर्गे को कैसे तैयार किया जाता है.
प्राचीन काल से चला रहा है मुर्गा लड़ाई
प्राचीन काल से ही मुर्गा लड़ाई का चलन रहा है. मनोरंजन के लिए लोग ये खेल खेलते थे. पालनाडु युद्ध यानी 1178-82 का परिणाम भी मुर्गे की लड़ाई से तय हुआ था. इसके बाद ये प्रथा शुरु हुई. आज के समय आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में ये खूनी खेल चलता है. वहीं, मध्य प्रदेश के बालाघाट में ये खेल आज भी चल रहा है.
ऐसे तैयार होते है लड़ाके
इसमें लड़ाके मुर्गों को खास तरह से ट्रेनिंग दी जाती है. वहीं, उसे ऐसे ट्रेन किया जाता है कि वह तुरंत ही लड़ने के लिए तैयार हो जाए. लड़ाई वाला मुर्गा हमेशा गुस्सैल दिखता है. ऐसे में कोई भी समझ सकता है कि वह लड़ाई वाला मुर्गा है. उनके पैरो में चाकू और ब्लेड बांधे जाते हैं. यह लड़ाई तब तक चलती है जब तक मुर्गा मौत के घाट नहीं उतर जाता. इन मुर्गों की कीमत हजारों में होती है.
खास डाइट और वातावरण
झाड़ू बाबा का कहना है कि मुर्गों को खास तरह की डाइट दी जाती है. जिससे वह ताकतवर तो होता ही है साथ ही मुर्गा गुस्सैल भी होता है. इसके लिए उसे घी, दाने, मुर्गी के अंडे खिलाए जाते हैं. कुछ खास केस में उन्हें काजू, बादाम सहित कई ड्राईफ्रूट खिलाए जाते हैं. वहीं, उसे खुला नहीं रखा जाता है. ऐसे में उसके अंदर गुस्सा भी पनपता है. ऐसे में जब भी वह खुला घूमता है, तो वह लोगों पर हमला कर देता है.
कानूनन प्रतिबंध लेकिन सिर्फ कागजों पर
वहीं, मध्य प्रदेश में बालाघाट में भी कई पीढ़ियों से ये खेल चल रहा है. हालांकि, इस खूनी खेल पर सरकार की तरफ से प्रतिबंध लगाया गया है. लेकिन ये सिर्फ कागजों पर है. वहीं, बालाघाट के कटंगी के पठार क्षेत्र के कई गांवों में आज भी ये खूनी खेल छिपकर बालाघाट में अब भी चलता है खूनी खेल चलता है लेकिन प्रशासन उस ओर ध्यान नहीं देता. जबकि, इस पर लोग गलत तरीके पैसे भी लगाते हैं यानी मुर्गों पर लाखों का सट्टा लगाते हैं.