एमपी के स्कूल शिक्षा विभाग ने आखिरकार अपनी गड़बड़ी मानते हुए निवाड़ी के प्राइवेट स्कूल के टीचरों से 15 करोड़ की रिकवरी के लिए पत्र जारी कर दिया है। साथ ही अब लोकायुक्त इस घोटाले की प्राथमिकी दर्ज करने की तैयारी में हैं। दरअसल, भास्कर ने नौ महीने पहले
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इन्हें सरकारी टीचरों की तरह ही एरियर और वेतनमान का फायदा मिल रहा है। ये गड़बड़ी केवल इसी स्कूल में नहीं है बल्कि प्रदेश के 54 स्कूलों में है। हालांकि, विभाग ने केवल इसी स्कूल से रिकवरी के आदेश दिए हैं। इस मामले की जांच करने वाले संयुक्त संचालक मृत्युंजय कुमार ने भास्कर से बातचीत में कहा कि उन्होंने केवल इसी स्कूल की जांच की है और रिपोर्ट लोकायुक्त को सौंप दी है। आगे की कार्रवाई विभाग और लोकायुक्त को करना है। आखिर क्या है ये मामला? पढ़िए रिपोर्ट
संयुक्त संचालक ने 4 नवंबर को रिकवरी आदेश निकाला है।
2 पॉइंट्स में जानिए, कैसे हुई गड़बड़ी
1. निवाड़ी जिले में प्राइवेट स्कूल को निकाय अधीन किया
इस गड़बड़ी की शुरुआत सरकार के ही एक आदेश से हुई थी। सरकार ने साल 2002 में 54 साल प्राइवेट स्कूलों को संबंधित जिला पंचायत और नगरीय निकायों के अधीन करने का आदेश जारी किया था। निवाड़ी जिले (तब टीकमगढ़ जिला) के नैगुवां स्थित शास्त्री हायर सेकेंडरी स्कूल सरकारी जमीन पर संचालित हो रहा था।
इस आधार पर इसे 2002 में किसी निकाय के अधीन नहीं किया। इसके खिलाफ स्कूल संचालक राजेंद्र पाठक ने 2005 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की। साल 2012 में हाईकोर्ट ने स्क्रीनिंग कमेटी बनाकर जांच के आदेश दिए। इसके बाद भी जब कमेटी का गठन नहीं हुआ, तो अवमानना याचिका दायर की गई। कोर्ट ने साल 2014 में आदेश देते हुए तत्कालीन कलेक्टर को कमेटी बनाकर जांच के लिए कहा।

2.साल 2017 में कमेटी ने निकाय के अधीन की अनुशंसा की साल 2015 में कमेटी ने फैसला दिया कि स्कूल सरकारी जमीन पर चल रहा है, स्कूल स्टाफ की एजुकेशनल क्वालिफिकेशन भी संदेह के दायरे में है। इसे निकाय के अधीन नहीं किया जा सकता। मगर, स्कूल किसी भी तरह से निकाय के अधीन आ जाए, इसकी कोशिश जारी रही।
साल 2017 में एक बार फिर स्क्रीनिंग कमेटी बनी। इस कमेटी ने स्कूल के सारे दस्तावेज सही मानते हुए इसे निकाय के अधीन करने की अनुशंसा कर दी। इस रिपोर्ट के आधार पर स्कूल के सभी टीचर्स की संविदा नियुक्ति के आदेश जारी हो गए। इसके बाद स्कूल ने खुद को सरकारी बताना शुरू कर दिया। दस्तावेजों में भी स्कूल सरकारी लिखने लगा।
इसके बाद स्कूल शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से एक आदेश निकला। इसमें स्कूल को सरकारी बताते हुए इसके टीचर्स की सैलरी सरकारी कोषालय से देने के आदेश हो गए। जब स्कूल के टीचर्स को सरकार सैलरी देने लगी तो स्कूल के संचालक ने 2002 से उन्हें एरियर भी दिलवा दिया। कई टीचरों को 10 से 15 लाख रुपए तक का एरियर मिला है।

ऐसे हुआ गड़बड़ी का खुलासा इसका खुलासा तब हुआ, जब नैगुवां के हायर सेकेंडरी स्कूल के प्रिंसिपल राजेंद्र पाठक को 31 मार्च 2023 को निवाड़ी जिले का डीईओ बनाने के आदेश जारी हुए। इस आदेश के बाद एक गोपनीय शिकायत हुई। जिसमें लिखा था कि पाठक तो जिला पंचायत के अधीन आने वाले स्कूल के प्रिसिंपल हैं। वे स्कूल शिक्षा विभाग के कर्मचारी भी नहीं हैं। विभाग ने जांच की तो शिकायत को सही पाया।
3 अप्रैल 2023 को स्कूल शिक्षा विभाग के उप सचिव ओएल मंडलोई ने आदेश जारी किया कि पाठक जिला पंचायत के कर्मचारी है, न कि स्कूल शिक्षा विभाग के। इन्हें डीईओ का प्रभार नहीं दिया जा सकता। इसके बाद पाठक को डीईओ पद से हटाकर शासकीय मॉडल स्कूल, पृथ्वीपुर के प्राचार्य काे डीईओ का प्रभार दिया गया।
इस आदेश के सामने आने के बाद पाठक सहित उनके स्कूल के 56 शिक्षकों के सरकारी सैलरी, एरियर और प्रमोशन समेत 7वां वेतनमान लेने की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठे।

नैगुवां के प्रिंसिपल राजेंद्र पाठक को डीईओ का प्रभार दिया गया था। स्कूल शिक्षा विभाग ने 2023 में उन्हें हटाने के आदेश जारी किए।
स्कूल शिक्षा विभाग ने कोई एक्शन नहीं लिया ये गड़बड़ी पहले भी सामने आ सकती थी। निवाड़ी के जिला शिक्षा अधिकारी ने पिछले साल ही इन तथाकथित सरकारी शिक्षकों से रिकवरी की सिफारिश करते हुए एक जांच रिपोर्ट भोपाल स्थित लोक शिक्षण संचालनालय को भेजी थी। विभाग ने दिखावे के लिए टीचर्स का वेतन रोक दिया, लेकिन किसी भी दोषी पर कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं कराया और मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
15 करोड़ की रिकवरी का आदेश दैनिक भास्कर ने जब इस मामले को उठाया और लगातार फॉलो-अप के बाद विभाग पर दबाव बना और एक उच्च-स्तरीय जांच समिति का गठन किया गया। सागर के संयुक्त संचालक (शिक्षा) मृत्युंजय कुमार ने अपनी जांच रिपोर्ट में लिखा कि अधिकारियों की मिलीभगत से ये घोटाला हुआ है। जांच में पाया गया कि कुल 15 करोड़ 88 लाख 88 हजार 995 रुपए का अनियमित भुगतान हुआ।
इसके लिए उन अधिकारियों को दोषी ठहराया गया है, जिनकी निगरानी में यह घोटाला फलता-फूलता रहा। इनमें नेगुंवा स्कूल के अस्थाई प्राचार्य राजेंद्र पाठक, तत्कालीन विकासखंड अधिकारी आरडी वर्मा और एन सी तिवारी, एसपी पांडेय, तत्कालीन सीईओ जिला पंचायत, डीईओ एसएन नीखरा और तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी बीएल लुहारिया को दोषी माना है। इन सभी से 15 करोड़ रुपए रिकवर करने की सिफारिश की गई है।

सागर के संयुक्त संचालक (शिक्षा) मृत्युंजय कुमार ने जांच रिपोर्ट लोक शिक्षण संचालनालय को भेज दी है।
54 स्कूलों की जांच के लिए नहीं उठाया कदम इस मामले को सामने लाने वाले एक्टिविस्ट तिलकराज का कहना है कि ये घोटाला केवल एक स्कूल में नहीं हुआ है। साल 2002 में प्रदेश के 54 स्कूलों को निकायों के अधीन किया गया था, जहां यह घोटाला हुआ। निवाड़ी के एक स्कूल में 15 करोड़ से अधिक की वसूली के आदेश के बाद भी, विभाग ने अब तक इन सभी स्कूलों की जांच के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है, जो अपने आप में एक बड़ा सवाल है।


इन 54 स्कूलों को नगरीय निकाय और जिला पंचायत के अधीन किया गया था।