इंजीनियरिंग छोड़ खेत संभाले! 2.5 बीघा से शुरू किया सफर, आज किसानों के लिए मिसाल बने धीरज

इंजीनियरिंग छोड़ खेत संभाले! 2.5 बीघा से शुरू किया सफर, आज किसानों के लिए मिसाल बने धीरज


Shivpuri News: शिवपुरी के धीरज रावत की कहानी आज कई युवाओं के लिए इंस्पिरेशन बन गई है. धीरज इंजीनियर बनने की पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन बीच में ही उन्होंने फैसला बदल दिया और गांव लौट आए. उन्हें लगा कि खेती सिर्फ हल चलाने का काम नहीं है, बल्कि दिमाग और तकनीक सही जगह लगाओ तो खेती भी लाखों कमाने वाला बिज़नेस बन सकती है. उन्होंने केमिकल वाली खेती छोड़कर पूरी तरह ऑर्गेनिक खेती शुरू की. धीरे-धीरे उनके मेहनत और प्रयोगों का असर दिखने लगा. आज धीरज की ऑर्गेनिक फसलें गांववालों के लिए सिर्फ सब्जियां नहीं, बल्कि हेल्दी, स्वादिष्ट और सुरक्षित खाना बन चुकी हैं.

धीरज रावत शिवपुरी जिले के रामनगर गधाई गांव के युवा किसान हैं, जिन्होंने इंदौर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी, लेकिन पढ़ाई के बाद नौकरी की बजाय खेती को अपना लक्ष्य बनाया. पारंपरिक खेती में बढ़ती लागत और घटते मुनाफे को देखकर उन्होंने जैविक खेती का रास्ता चुना. धीरज रावत ने बताया कि भविष्य उन्हीं किसानों का है जो मिट्टी, पानी और खाद की सही समझ रखते हैं. पारंपरिक खेती के घटते मुनाफे से परेशान होकर उन्होंने जैविक खेती को चुना और साबित किया कि प्रकृति के साथ काम करने से न सिर्फ मिट्टी सुधरती है बल्कि पूरे गांव की सोच बदल सकती है.

गांव में बदलाव 
जब धीरज ने पहली बार 2.5 बीघा में जैविक खेती शुरू की तो उन्होंने अपनी उपज बाजार में बेचने के बजाय गांव के लोगों को बांट दी, ताकि वे रसायन-रहित असली स्वाद को पहचान सकें. ककड़ी, लौकी, टमाटर, भिंडी और अन्य सब्जियों का स्वाद गांव वालों को इतना पसंद आया कि लोग जैविक खेती की ओर प्रेरित होने लगे. धीरज मानते हैं कि परिवर्तन थोपकर नहीं, समझ और स्वाद से आता है.

पशुपालन भी करते हैं धीरज
धीरज पशुपालन भी करते हैं, जिससे उन्हें खेतों के लिए लगातार ताज़ा और प्राकृतिक गोबर उपलब्ध होता है. उनका कहना है कि जिन किसानों के पास मवेशी हैं, उनके लिए जैविक खेती करना और भी आसान हो जाता है. मवेशियों के ठोस और द्रव मल-मूत्र से बनी खाद मिट्टी की सेहत को प्राकृतिक रूप से सुधारती है. इसी कारण उन्होंने खेती और पशुपालन को साथ जोड़कर एक स्थायी मॉडल तैयार किया.

वर्मी कम्पोस्ट बनाने की ट्रेनिंग 
धीरज बताते हैं कि भिंडी जैसी फसलों पर जैविक तकनीक का तुरंत असर दिखता है. भिंडी के बीज 20 से 25 डिग्री तापमान पर बेहतर अंकुरित होते हैं और 17 डिग्री से कम तापमान पर अंकुरण लगभग रुक जाता है. जैविक खाद, सही नमी और तापमान प्रबंधन से भिंडी जल्दी बढ़ती है, धीरज खुद वर्मी कम्पोस्ट तैयार करते हैं और गांव के किसानों को भी इसकी विधि सिखाते हैं. वे बताते हैं कि सही नमी, छायादार स्थान और गोबर में छोड़े गए केंचुए धीरे-धीरे मिट्टी जैसा मुलायम कम्पोस्ट तैयार करते हैं, जो फसल के लिए अमृत के समान होता है. वह किसानों को ट्रेनिंग भी देते हैं.

20 दिन का फार्मूला 
धीरज बताते हैं कि जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया बेहद सरल है. बस 10 किलो गोबर, 10 लीटर गोमूत्र, 1 किलो गुड़, 1 किलो चोकर, 1 किलो मिट्टी और थोड़ा पानी मिलाकर एक घोल तैयार करना होता है. इसे 20 दिन तक छाया में रखकर रोज हिलाने से सूक्ष्मजीव सक्रिय रहते हैं और खाद तैयार हो जाती है. यह खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और फसल की गुणवत्ता सुधारने में अत्यंत प्रभावी है.



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