6 साल की मासूम से रेप का आरोपी सलमान एक शॉर्ट एनकाउंटर के बाद घायल हो गया। उसका हमीदिया अस्पताल में इलाज चल रहा है। 27 नवंबर की आधी रात को जब रायसेन जिले की गौहरगंज थाने की पुलिस उसे गिरफ्तार कर ले जा रही थी तभी भोपाल से तीस किमी दूर कीरत नगर के पास
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उसने पुलिस हिरासत से फरार होने की कोशिश की। जवाब में पुलिस ने गोली चलाई, जो सीधे सलमान के पैर में लगी। इस शॉर्ट एनकाउंटर के बाद पुलिस ने उसे दोबारा दबोच लिया। यह घटना मध्य प्रदेश में पिछले एक महीने में हुई पांचवीं ऐसी मुठभेड़ थी। ये सभी मामले हाई-प्रोफाइल थे, जिनमें जनता का गुस्सा उफान पर था और अपराधियों को ‘गोली मारने’ तक की मांग उठ रही थी।
इस एनकाउंटर से ठीक एक दिन पहले मुख्यमंत्री ने खुद आरोपी की गिरफ्तारी को लेकर पुलिस अफसरों के साथ एक हाई-लेवल मीटिंग की थी। ये घटनाएं एक बड़ा सवाल खड़ा करती हैं कि क्या मध्य प्रदेश पुलिस राजनीतिक और सामाजिक दबाव में आकर इस तरह की कार्रवाई कर रही है? या फिर यह अपराधियों से निपटने का एक नया, आक्रामक तरीका है?
दैनिक भास्कर ने इन पांचों एनकाउंटर की गहराई से पड़ताल की और एक्सपर्ट से बात कर इसके पीछे की सच्चाई जानने की कोशिश की।
वो पांच केस, जिन्होंने ‘शॉर्ट एनकाउंटर’ को चर्चा में ला दिया
गाड़ी पंक्चर हुई तो भागने की कोशिश 21 नवंबर को 6 साल की बच्ची को चॉकलेट दिलाने के बहाने जंगल ले जाकर रेप करने वाला 23 वर्षीय सलमान खान फरार था। उस पर 30 हजार का इनाम घोषित था और जनता में भारी आक्रोश था। मुख्यमंत्री की फटकार के बाद पुलिस ने 27 नवंबर की रात उसे भोपाल से गिरफ्तार किया। रात करीब 3 बजे जब पुलिस उसे गाड़ी से रायसेन ले जा रही थी, तो कील लगने से गाड़ी पंक्चर हो गई।
जैसे ही उसे बैकअप गाड़ी में शिफ्ट करने की कोशिश की गई, सलमान ने सुल्तानगंज के थाना प्रभारी श्याम राजा की पिस्टल छीनकर उन पर फायर करने की कोशिश की। एसआई रजक ने बचाव में उसका हाथ ऊपर कर दिया, जिससे दो गोलियां हवा में चलीं। इसी बीच, दूसरी टीम ने क्रॉस फायरिंग की और भागने की कोशिश कर रहे सलमान के पैर में गोली मार दी।
इस झड़प में थाना प्रभारी को भी चोटें आईं। घायल सलमान को हमीदिया अस्पताल में भर्ती कराया गया था। सलमान अब 10 दिन की पुलिस रिमांड पर है।

टॉयलेट का बहाना कर फरार होने की कोशिश पुलिस टीम 26 नवंबर को रिटायर्ड शिक्षिका की हत्या के आरोपी सागर मीणा को झाबुआ बॉर्डर से पकड़कर ला रही थी। यह हत्या शिक्षिका की नौकरानी और उसकी बेटी ने पैसों के लालच में सागर के साथ मिलकर रची थी। रावटी और रानी इलाके के बीच रात करीब 12:30 बजे सागर ने टॉयलेट का बहाना बनाया।
गाड़ी रुकते ही वह उतरा और थाना प्रभारी अनुराग यादव को धक्का देकर उनकी पिस्टल छीनने की कोशिश की। जब टीआई यादव ने उसे पकड़ना चाहा, तो उसने उन पर पिस्टल तान दी और भागने लगा। आत्मरक्षा में टीआई सत्येंद्र रघुवंशी ने आरोपी के पैर में गोली मार दी, जिससे वह घायल होकर गिर पड़ा।

सरेंडर के लिए कहा, तो आरोपी ने फायरिंग की 10 हजार का इनामी हिस्ट्रीशीटर कपिल यादव जमीन विवाद में कुछ लोगों पर हमला करने के बाद से फरार था। 24 नवंबर को पुलिस को सूचना मिली कि वह मोहनपुर के एक ईंट भट्टे पर छिपा है। पुलिस टीम ने जब उसे घेरा और सरेंडर करने को कहा, तो उसने पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी।
पुलिस ने जवाबी कार्रवाई की, जिसमें कपिल के पैर में गोली लगी। उसे एक अवैध हथियार के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। कपिल पर करीब 12 आपराधिक केस दर्ज हैं और उस पर पहले NSA भी लग चुका है।

पुलिस को देख फायरिंग शुरू कर दी 19 नवंबर को पेट्रोल पंप और हाईवे पर लूट करने के बाद पुलिस आरक्षक चंद्रकांत तिवारी से मारपीट कर फरार हुए मनीष करिया की पुलिस तलाश कर रही थी। 22 नवंबर की सुबह पुलिस को उसके धनवाही के जंगलों में छिपे होने की सूचना मिली। पुलिस टीम के पहुंचते ही मनीष ने फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में पुलिस की गोली उसके पैर में लगी और उसे दबोच लिया गया। इस घटना में एक पुलिस जवान भी घायल हुआ।

आरोपियों को घेरा तो उन्होंने गोलियां चलाईं 27 अक्टूबर को भाजपा के पिछड़ा वर्ग मंडल अध्यक्ष नीलेश रजक की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना के बाद भारी जनाक्रोश था और परिजन 7 घंटे तक प्रदर्शन करते रहे। 28-29 अक्टूबर की दरमियानी रात करीब 2 बजे पुलिस को आरोपियों के कजरवारा इलाके में होने की सूचना मिली।
पुलिस ने घेराबंदी की तो आरोपियों ने फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस ने जवाबी कार्रवाई में चार राउंड फायर किए, जिसमें आरोपी अकरम खान और प्रिंस के पैर और हाथ में गोली लगी। दोनों को घायल अवस्था में गिरफ्तार कर लिया गया।
क्या होता है ‘शॉर्ट एनकाउंटर’? अपने करियर में 100 से ज्यादा एनकाउंटर कर चुके एमपी पुलिस के रिटायर्ड डीएसपी अशोक सिंह भदौरिया बताते हैं कि शॉर्ट एनकाउंटर वह सिचुएशन है जब पुलिस और आरोपी के बीच अचानक मुठभेड़ जैसी स्थिति बन जाए और कुछ ही सेकेंड या मिनटों में जवाबी कार्रवाई करनी पड़े।
इसमें कोई लंबी योजना या बड़ा ऑपरेशन नहीं होता, बल्कि आरोपी के भागने, हमला करने या हथियार छीनने की कोशिश पर पुलिस तत्काल प्रतिक्रिया देती है।

एनकाउंटर के पीछे का दबाव और मनोविज्ञान पुलिस के इन पांचों एनकाउंटर में एक पैटर्न साफ नजर आता है-ये सभी अपराध गंभीर थे और इनकी गिरफ्तारी को लेकर जनता का पुलिस पर भारी दबाव था। गौहरगंज रेप मामले में जब आरोपी पांच दिन तक नहीं पकड़ा गया तो सीएम मोहन यादव ने 6 नवंबर को पीएचक्यू में सीएस, डीजीपी, एडीजी इंटेलिजेंस सहित शीर्ष अधिकारियों की बैठक ली थी।
उन्होंने आरोपी की गिरफ्तारी न होने पर गहरी नाराजगी जताई थी, जिसके बाद रायसेन एसपी को हटाकर पुलिस हेडक्वॉर्टर अटैच कर दिया गया था। बैठक के ठीक एक दिन बाद आरोपी न सिर्फ पकड़ा गया, बल्कि उसका एनकाउंटर भी हो गया।

एक्सपर्ट बोले- पुलिस पर प्रेशर और जनता का खोता संयम रिटायर्ड आईपीएस एनके त्रिपाठी का कहना है, ‘हाई-प्रोफाइल अपराधों में पुलिस पर अपराधी को पकड़ने का काफी दबाव होता है। यह दबाव जनता, मीडिया और प्रशासन, तीनों स्तरों पर होता है। ऐसे में अगर अपराधी पुलिस की गिरफ्त से भागने में कामयाब होता है, तो इसे पुलिस की विफलता माना जाता है।
खतरनाक अपराधी कई बार हथियारों से लैस होते हैं, इसलिए ऐसे मामलों में पुलिस को आत्मरक्षा के लिए एनकाउंटर जैसी कार्रवाई करनी पड़ती है।’ हालांकि, त्रिपाठी यह भी जोड़ते हैं, “मानवाधिकार आयोग और न्यायपालिका द्वारा एनकाउंटर की विश्वसनीयता पर अक्सर सवाल उठाए जाते हैं। पुलिस कई बार फर्जी एनकाउंटर भी करती है, लेकिन ऐसा हर बार नहीं होता। पुलिस का पक्ष भी देखा जाना जरूरी है।

कानून की नजर में सबूत ही सबकुछ भोपाल जिला न्यायालय के सीनियर एडवोकेट नरेंद्र सिंह चौहान कहते हैं कि कोर्ट की नजर में सबूत ही सबकुछ होता है। किसी एनकाउंटर के मामले में जो सबूत कोर्ट के सामने पेश किए जाते हैं। उनके आधार पर ही कोर्ट फैसला देता है। कई बार कोर्ट के फैसलों में ये पाया गया है कि पुलिस की एनकाउंटर की थ्योरी झूठी होती है।
जब ऐसे मामले कोर्ट के सामने आते हैं तो कोर्ट के आदेश से इनकी जांच होती है। हालांकि, पुलिस के एनकाउंटर के कुछ मामले सच भी होते हैं। चौहान कहते हैं कि पुलिस को गोली चलाने का कानूनी आधार 4 परिस्थितियों में मिलता है।
- जब आरोपी से पुलिस या किसी नागरिक की जान को सीधा खतरा हो।
- जब आरोपी पुलिस पर घातक हमला करे।
- भागने की कोशिश में वह किसी की जान को खतरा पैदा करे।
- जब पुलिस के पास आत्मरक्षा के अलावा कोई और विकल्प न बचा हो।

अपराधियों में डर पैदा करने की रणनीति? नाम न बताने की शर्त पर कुछ पुलिस अधिकारियों ने कहा कि संवेदनशील मामलों में जनता के बीच ‘त्वरित न्याय’ की धारणा पनपती है। बढ़ते अपराध को रोकने और बदमाशों को एक कड़ा संदेश देने के लिए ‘शॉर्ट एनकाउंटर’ जैसी कार्रवाई करनी पड़ती है। इससे अपराधियों में कानून और पुलिस का डर बना रहता है, जो अपराध नियंत्रण के लिए जरूरी है।