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कार कंपनियां Ferrari, Lamborghini जैसी ब्रांड्स के लिए रंगों का चुनाव गहरी रिसर्च, साइकोलॉजी और ट्रेंड फोरकास्टिंग से करती हैं, जिससे उपभोक्ता का मूड और मार्केट ट्रेंड झलकता है. अगर आप सोचते हैं कि आप अपने मन से कार का कलर पसंद करते हैं तो एक बार फिर सोचिए. समझिए कार के कलर स्कीम से जुड़ी पूरी साइकॉलजी.
भारत में ज्यादातर लोगों के लिए कार खरीदना आज भी एक बड़ी बात है. कार खरीदने से पहले आप कई चीजें देखते हैं. सबसे पहली चीज है लुक. किसी भी कार के लुक को क्रिएट करने में कार के कलर का बहुत बड़ा हाथ होता है. पर क्या कभी आपने सोचा है कि आप कार का कलर अपनी मर्जी से चुनते हैं या इसके पीछे कंपनियों की कोई स्ट्रैटिजी है? कार के कलर के पीछे कंपनियां बहुत रिसर्च करती हैं. आइए, समझते हैं गाड़ियों की कलर स्कीम के पूरे सिस्टम को.

कार कंपनियां अपनी अगली कार का रंग तय करने के लिए सिर्फ ‘फैशनेबल’ होने का इंतज़ार नहीं करतीं; वे एक गहन साइकलॉजिकल और मार्केटिंग रणनीति के तहत काम करती हैं. यह खेल सिर्फ रंग का नहीं, बल्कि उपभोक्ता के मन को पढ़ने का है.

कंपनियां कैसे तय करती हैं आपकी अगली कार का रंग? कार के रंग का चुनाव एक 3-4 साल लंबी प्रक्रिया होती है, जिसमें डिज़ाइनर, मार्केट रिसर्चर और कलर केमिस्ट शामिल होते हैं.
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साइकोलॉजी और ट्रेंड फोरकास्टिंग- कंपनियां सिर्फ फैशन ट्रेंड नहीं देखतीं, बल्कि यह भी देखती हैं कि समाज और ग्लोबल इवेंट्स लोगों के मूड को कैसे बदल रहे हैं.

जब दुनिया में अनिश्चितता होती है (जैसे महामारी या आर्थिक अस्थिरता), तो लोग सफेद , काला और ग्रे/सिल्वर जैसे न्यूट्रल रंगों की ओर ज़्यादा आकर्षित होते हैं. ये रंग सेफ्टी, स्टेबिलिटी और क्लासिक लुक का सिंबल हैं.

जब अर्थव्यवस्था अच्छी होती है या लोग बदलाव चाहते हैं, तो वे बोल्ड कलर्स, जैसे कि गहरा नीला, हरा या ब्राइट रेड पसंद करते हैं.

स्पोर्ट्स कार- ये ब्रांड्स अक्सर चमकीले और वाइब्रेंट कलर पर जोर देते हैं (जैसे फरारी का सिग्नेचर रेड, या Lamborghini का नियॉन येलो/ग्रीन जो स्पीड और पैशन को दर्शाते हैं.

लग्जरी कारें- ये ब्रांड्स गहरे, मेटैलिक और कस्टमाइज़्ड रंगों का इस्तेमाल करते हैं. ये रंग समृद्धि, विशिष्टता और गहराई को दर्शाते हैं. उदाहरण के लिए, एक ख़ास ‘डीप एमरल्ड ग्रीन’ या ‘सैफायर ब्लू’.