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Sagar Banyan Tree: सागर के एक किसान ने अपने पूर्वजों की निशानी सहेजने के लिए ऐसा निर्णय लिया जो अब चर्चा का विषय है. उनके फैसले की वजह से कभी डकैतों का ठिकाना रही जगह पिकनिक स्पॉट बन गई. जानें कहानी…
Sagar News: आज के समय में जमीन के भाव आसमान छू रहे हैं. एक-एक फीट जगह के लिए विवाद हो जाते हैं. लेकिन, सागर के एक किसान ने अपने पूर्वजों की निशानी सहेजने के लिए ढाई एकड़ जमीन पर खेती करना ही छोड़ दिया. अपने इस खेत को विशाल भारी भरकम बरगद के हवाले कर दिया. प्रकृति के प्रति उनका ऐसा प्रेम देखकर आज हर कोई उनकी सराहना करता है. यही नहीं, प्रकृति प्रेमी इस विशालकाय पेड़ को देखने के लिए दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं. यह स्थान आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.
बता दें, सागर के जैसीनगर तहसील में आने वाले पड़रई गांव की पहचान इसी बरगद वाले गांव के रूप में है. यह पेड़ किसने लगाया था? कब लगाया था? क्यों लगाया था? यह तो किसी को पता नहीं, लेकिन इसके विस्तार को देख इसे 200 साल से अधिक पुराना माना जाता है. इस विशालकाय पेड़ का अंदाजा ऐसे लगा सकते हैं कि पहले इस पेड़ के पास ठाकुर बाबा का चबूतरा हुआ करता था, लेकिन इसके बढ़ते आकार की वजह से चबूतरा तना के अंदर चला गया और फिर गांव वालों ने कुछ साल पहले इस पेड़ से बाहर की तरफ दूसरा चबूतरा बनवाकर छोटी सी मड़िया बनवाई. जहां गांव के लोग जाकर पूजन भी करते हैं.
पिकनिक स्पॉट बन गई जगह
बरगद का यह पेड़ ढाई एकड़ में फैला है, जिसकी शाखाएं इतनी बड़ी और मोटी हैं कि जो सामान्य दूसरे पेड़ों से कई गुना अधिक हैं. यहां तक की अब यह जगह टूरिस्ट स्थल के रूप में भी जानी जाने लगी है. क्योंकि, धर्म संस्कृति से जुड़े आयोजन तीज-त्याेहार होने पर लोग यहां घूमने के लिए आते हैं. इस खूबसूरत पेड़ को निहारत हैं. साथ तस्वीरें लेते हैं. इस अद्भुत अनूठे पेड़ को देख कर अपने आप को कृतार्थ मानते हैं.
पूर्वजों की परंपरा को बढ़ा रहा
किसान ऋषिराज सिंह का मानना है, ‘प्रकृति से बड़ा कोई धन नहीं. खेती कम हो जाए तो भी चलेगा, लेकिन पूर्वजों की निशानी और इस जीवित धरोहर को नुकसान पहुंचाना मेरे लिए पाप है. ऋषिराज बताते हैं कि यह पेड़ आज से नहीं, बल्कि हमारी तीन-चार पीढ़ी पहले से है. जिस तरह हमारे पूर्वज इसको संरक्षित करके रखे रहे, पूजते रहे. आज हम भी उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.
आज भी लोग डरते हैं…
गांव के चतुर्भुज सिंह बताते हैं कि यह पेड़ इतना बड़ा है कि पहले यहां डकैतों का डेरा रहता था. लेकिन, किसी की भी यहां आने की हिम्मत नहीं होती थी. इस पेड़ की शाखों के अंदर नहीं जाते थे. आज भी लोग इसकी छाया में अकेले जाने से डरते हैं.
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एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय. प्रिंट मीडिया से शुरुआत. साल 2023 से न्यूज 18 हिंदी के साथ डिजिटल सफर की शुरुआत. न्यूज 18 के पहले दैनिक जागरण, अमर उजाला में रिपोर्टिंग और डेस्क पर कार्य का अनुभव. म…और पढ़ें