ग्वालियर की एक 35 वर्षीय महिला, जिसे पुलिस ने हत्या और सबूत मिटाने के आरोप में 302 व 201 के तहत गिरफ्तार किया था, आखिरकार 431 दिन जेल में बिताने के बाद जिला न्यायालय से दोषमुक्त कर दी गई।
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पुलिस ने उस पर आरोप लगाया था कि उसने एक व्यक्ति को जहर देकर मार दिया। लेकिन डेढ़ साल चले ट्रायल में न तो पुलिस ठोस सबूत दे सकी, न बयान अदालत में टिक पाए। आखिरकार कोर्ट ने कहा- साक्ष्य के अभाव में आरोपी को दोषमुक्त किया जाता है।
दैनिक भास्कर टीम महिला के घर पहुंची। मिट्टी की दीवार, टूटी चारपाई, कोने में बच्चों की किताबें और धूप से झुलसा चेहरा, वह बार-बार यही कहती रही- मैंने क्या किया था? बस एक रात में सब छीन लिया गया। 431 दिन… यह कोई भूल सकता है क्या?”
जहरीला पदार्थ की वजह से हुई थी मौत मुरैना के उत्तर पुरा थाना स्टेशन रोड निवासी 30 वर्षीय महेश जाटव पुत्र रामेश्वर जाटव की जहरीले पदार्थ के कारण मौत हो गई थी। जानकारी के अनुसार मृतक महेश की एक महिला से दोस्ती थी, लेकिन कुछ समय पहले से उसने मिलना बंद कर दिया था। इस कारण महेश नाराज चल रहा था। वह कभी-कभार मिलने के लिए आया-जाया करता था।
बताया जाता है कि 26 जून 2024 की दोपहर तीन बजे महेश जाटव, महिला दोस्त से मिलकर निकला था। इसके बाद जैसे ही वह घर पहुंचा तो उसकी तबीयत बिगड़ गई। तबीयत खराब होने पर महेश के भाई रवि ने उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराया, जहां से उसे ग्वालियर रेफर किया गया।
ग्वालियर के जेएएच मेडिकल कॉलेज में उसकी 22 जून 2024 को मौत हो गई। मौत से पहले महेश ने डॉक्टर के सामने बयान में महिला दोस्त का नाम लिया था। उसी के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज किया था और महिला को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
पुलिस ने कहा तुमने जहर दिया है महिला उस रात को याद करती है और कांप जाती है। “23 सितंबर 2024… रात करीब 10:30 या 11 बजे होंगे। पति मजदूरी पर गए थे। घर पर मैं और बच्चे थे। अचानक दरवाजे पर जोर-जोर से दस्तक हुई। मैंने पूछा- कौन? जवाब आया- सिविल लाइन थाना पुलिस। दरवाजा खोलिए।’ डर लगने लगा, पर मजबूरी थी, पुलिस थी… दरवाजा खोला।” गाड़ी के पास बाकी पुलिसकर्मी खड़े थे। एक महिला सिपाही भी।
“जैसे ही मैंने दरवाजा खोला, उन्होंने बस इतना कहा- चलो, काम है।’ मुझे पकड़ा और गाड़ी में बैठा लिया। बोले- सुबह घर आ जाओगी।’ लेकिन सुबह तो आई ही नहीं… रातभर थाने में रखा। बार-बार कहा- तुमने उसको जहर दिया है, तुमने हत्या की है।’ मैं कुछ समझ ही नहीं पा रही थी।” घर में बच्चे रोते रहे, पति को किसी तरह खबर पहुंची।
“सुबह वह थाने पहुंचे, पर उनसे भी मिलने नहीं दिया गया। बस मेरा फोटो लिया, साइन करवाए और 24 सितंबर को कोर्ट में पेश कर मुझे जेल भेज दिया। बोला- ‘दो दिन में जमानत हो जाएगी।’ लेकिन 431 दिन लग गए बाहर आने में।”

जेल के 431 दिन: खाना कीड़ों वाला, दाल पानी जैसी… महिला का चेहरा बदला-बदला-सा हो गया जब उसने जेल की बात शुरू की। “लोग कहते हैं नरक देखा नहीं… पर मैं कहती हूं जेल ही नरक है। खाना ऐसा कि खाया ही न जाए, कभी सब्जी में कीड़े, कभी दाल पानी जैसी। शिकायत करो तो उल्टा सजा मिलती। जो गरीब होता है, वही पिसता है। पैसे वालों का तो जेल में भी जलवा है।”
महिला बताती है- जिनके पास पैसा था, उनके लिए अलग ट्रीटमेंट। सब्जियां मनपसंद, बीड़ी-गुटखा, सब मिलता था। जैसे घर हो और हम गरीब… बस भगवान भरोसे। न ठीक इलाज, न सही खाना।
पति बोला: पुलिस-कोर्ट का मतलब तक नहीं पता था पति ने बताया कि जब पत्नी को पुलिस ले गई, तो मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई। मजदूरी करने वाला आदमी… पुलिस, कोर्ट, वकील, कुछ नहीं पता था। तीन बेटियां, एक बेटा… सब मेरी जिम्मेदारी। सुबह बच्चों को तैयार करता, रात की बनी रोटी देता, फिर मजदूरी पर जाता। रात को लौटकर खाना बनाता।
431 दिन में सिर्फ 2–3 बार ही पत्नी से मिलने जा सका। किराया लगता था, मजदूरी छूट जाती थी। वकील के पैसे तक नहीं थे। बस भगवान ही था सहारा।

मुरैना का जिला न्यायालय।
वकील बोले- पुलिस पुख्ता साक्ष्य नहीं दे सकी वकील सुनील कुमार का कहना है कि पुलिस ने आरोप तो लगा दिया, पर एक भी पुख्ता साक्ष्य नहीं दे सकी। डॉक्टर ने मृत्यु से पहले बयान दर्ज किया था, पर उसमें महिला का सिर्फ नाम लिखा- न पति का नाम, न गांव। उस नाम की उसी गांव में 15 महिलाएं रहती हैं। पुलिस न पहचान कर सकी, न सबूत जुटा सकी। ऐसे ही किसी को जेल भेज दिया गया।
साक्ष्य-पहचान नहीं, बयान अधूरा… सिविल लाइन थाना पुलिस की जांच में कई गंभीर खामियां सामने आईं। मौत से पहले दिया गया बयान अधूरा था और उसमें महिला की पूरी पहचान दर्ज नहीं की गई। एफआईआर में सिर्फ महिला का नाम लिखा गया था। न पति का नाम था, न जाति का उल्लेख। गांव में उसी नाम की 15 महिलाएं दर्ज होने के बावजूद पुलिस ने पहचान की पुष्टि नहीं की।
जहर दिए जाने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण भी पेश नहीं किया गया और न ही घटनास्थल की विधिवत जांच की गई। इन सभी कमियों के बीच महिला को जेल भेज दिया गया, लेकिन अदालत ने स्पष्ट कहा- ऐसे आरोप सिद्ध नहीं होते।
बच्चे बोले- मां अब कहीं मत जाना अदालत से बरी होने के बाद महिला का पहला सवाल यही था कि क्या वह सीधे अपने बच्चों के पास जा सकती है। 431 दिन जेल में बिताने के बाद जब वह घर लौटी तो उसकी तीनों बेटियां और बेटा दौड़कर उससे लिपट गए।
बच्चे रोते हुए बार-बार कहते रहे- मां, अब कहीं मत जाना। यह सुनकर महिला खुद भी रो पड़ी। उसने कहा कि इतने लंबे समय तक बच्चों का चेहरा न देख पाना उसके लिए सबसे बड़ी सजा थी। हर दिन उसे डर लगता था कि शायद जिंदगी में दोबारा उन्हें छू भी पाएगी या नहीं। घर लौटकर बच्चों को सीने से लगाते ही उसे लगा जैसे उसके भीतर का बोझ अचानक हल्का हो गया हो और 431 दिनों की कसक एक ही पल में बाहर निकल गई।
