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Matar ki Kheti: सतना में किसान दिसंबर के अंतिम दिनों में भी मटर की लेट सॉइंग से उत्कृष्ट उत्पादन ले रहे हैं. जल्दी पकने वाली किस्मों, सही बुवाई तकनीक और पाले से बचाव के उपायों से किसान रबी सीजन में अतिरिक्त आय कमा रहे हैं. जानिए विशेषज्ञों और हाईटेक किसानों से मिली खास जानकारी.
शिवांक द्विवेदी, सतना: दिसंबर के अंतिम दिनों में जब किसान रबी सीजन की तैयारियों को अंतिम रूप दे रहे होते हैं ठीक उसी समय मटर की देर से बुवाई उनकी आय बढ़ाने का एक मज़बूत अवसर बनकर सामने आती है. ठंडा मौसम मटर की फसल के लिए स्वाभाविक रूप से अनुकूल होता है जिससे दिसंबर में की गई लेट सॉइंग भी बेहतर उत्पादन का भरोसा देती है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसान इस अवधि में जल्दी पकने वाली किस्में चुनते हैं तो न केवल पैदावार अच्छी मिलती है बल्कि मार्च तक फसल सुरक्षित रूप से बाजार में उतारी जा सकती है. लोकल 18 से बातचीत में सतना के हाईटेक किसान अंशुमान सिंह बताते हैं कि दिसंबर लास्ट में भी कई ऐसी किस्में हैं जो गर्मी आने से पहले ही बेहतरीन उत्पादन दे देती हैं बस खेती का तरीका सही होना चाहिए.
लेट सॉइंग में क्यों फायदेमंद है मटर की खेती?
दिसंबर माह में मटर की देर से बुवाई के बावजूद ठंडा और नम मौसम पौधों की वृद्धि को सहारा देता है. बुवाई से पहले खेत में अच्छी तरह गोबर की खाद मिलाना, बीजों को कैप्टन या थीरम जैसे फफूंदनाशक और राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना खेती की शुरुआत को मजबूत बनाता है. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि दोमट और जल निकासी वाली मिट्टी चुनना, साथ ही बीजों को 3–4 सेंटीमीटर गहराई पर बोना अंकुरण को बेहतर बनाता है. पंक्ति दूरी 30–40 सेंटीमीटर और पौधे टू पौधे दूरी 15–20 सेंटीमीटर रखने से पौधों को उचित पोषण मिलता है.
पाला, कीट और पोषण प्रबंधन से मिलती है बेहतर पैदावार
दिसंबर जनवरी में पाला एक बड़ी चुनौती है जिसे नजरअंदाज करना भारी नुकसान दे सकता है. 0.1% सल्फर घोल या हल्की नाइट्रोजन खाद का छिड़काव तापमान बढ़ाने में मदद करता है और पौधों को पाले से बचाता है. इसी तरह माहू और सफेद मक्खी जैसे कीटों से बचाव के लिए नीम तेल और अन्य जैविक कीटनाशकों का उपयोग सुरक्षित और प्रभावी माना जाता है. बुवाई के 20–25 दिन बाद की पहली निराई गुड़ाई पौधों को पर्याप्त पोषण देती है और खरपतवार नियंत्रण में मदद करती है.
किसान इन चार पछेती किस्मों से कमा रहे हैं अच्छा मुनाफा
दिसंबर के अंतिम सप्ताह में बोने के लिए जो किस्में सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं, उनमें जवाहर मटर (JM-1) अव्वल है. यह किस्म लगभग 90 दिनों में तैयार होती है और बुवाई के 30–35 दिनों बाद फूल आने लगते हैं. दूसरी प्रमुख किस्म आज़ाद मटर है जिसमें अंकुरण 7–10 दिनों में और फली बनना 40–50 दिनों में शुरू हो जाता है. मार्च के मध्य तक इसकी पहली तुड़ाई मिल जाती है. तेज़ी से बढ़ने वाली किस्मों में काशी नंदिनी और आर्केल किसानों की पसंद हैं क्योंकि ये मात्र 60–65 दिनों में तैयार होकर बाजार में जल्दी पहुंच जाती हैं.
दिसंबर की लेट सॉइंग से भी मिलता है भरपूर लाभ
अगर किसान उचित प्रबंधन और जल्दी पकने वाली किस्मों का चयन करें तो दिसंबर की देर से की गई मटर बुवाई भी बेहतरीन उत्पादन देती है. विशेषज्ञों के अनुसार यह तरीका किसानों को रबी सीजन में अतिरिक्त और स्थिर कमाई दिलाता है जो मौजूदा कृषि अनिश्चितताओं में एक बड़ी राहत साबित होती है.
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Shweta Singh, currently working with News18MPCG (Digital), has been crafting impactful stories in digital journalism for more than two years. From hyperlocal issues to politics, crime, astrology, and lifestyle,…और पढ़ें