नई दिल्ली. लियोनेल मेसी भारत एक फुटबॉल देवता की तरह आए थे.लेकिन वे यहाँ से एक वीआईपी सर्कस के प्रॉप की तरह लौटे. जिसे “G.O.A.T इंडिया टूर” के रूप में प्रचारित किया गया था, वह भारतीय खेल इतिहास के सबसे शर्मनाक तमाशों में दर्ज हो गया. मेसी की वजह से नहीं, बल्कि इस वजह से कि भारत ने उनकी मेज़बानी कैसे की. यह फुटबॉल का उत्सव नहीं था. यह पहुँच, हक़दारी और संस्थागत घमंड का भद्दा प्रदर्शन था, जहाँ नेताओं, बॉलीवुड सितारों और कॉरपोरेट एलीट्स ने एक वैश्विक खेल आइकन को चलता-फिरता सेल्फ़ी बूथ बना दिया. फैंस ने पैसे दिए और वीआईपी ने पोज़ दिए.
कोलकाता,मुंबई और अन्य शहरों में हज़ारों सच्चे फुटबॉल फैंस ने भारी-भरकम टिकट खरीदे कई मामलों में एक महीने की तनख़्वाह के बराबर सिर्फ़ वहाँ मौजूद होने के लिए बदले में उन्हें मिला बहिष्कार. पिच और उसके आसपास का पूरा इलाक़ा वीआईपी ज़ोन में बदल दिया गया, जहाँ नेताओं के परिवार, सोशलाइट्स और फ़िल्मी सितारे भरे पड़े थे जिनका फुटबॉल से कोई लेना-देना नहीं था और मौके के प्रति कोई सम्मान भी नहीं. मेसी, जिनके लिए लोग टिकट लेकर आए थे, स्टैंड्स से मुश्किल से दिखते थे हर समय सुरक्षा घेरा, आयोजक और सत्ता के दलालों से घिरे हुए, जो बस क़रीबी तस्वीर के लिए बेताब थे.
कोलकाता में लगी कालिख
मेसी, लुइस सुवारेज़ और रोड्रिगो डे पॉल को बार-बार रोका गया, घेर लिया गया, और उन्हें बुनियादी निजी स्पेस तक नहीं दिया गया. कोई योजना नहीं।कोई संयम नहीं।कोई सम्मान नहीं।बस सत्ता का नंगा इस्तेमाल. कोलकाता जिसे फुटबॉल शहर के नाम से जाना जाता है उसको तमाशा बना दिया गया. अगर कोई एक शहर बेहतर का हक़दार था,तो वह कोलकाता थाजहाँ फुटबॉल कंटेंट नहीं, संस्कृति है. लेकिन कोलकाता चरण कुप्रबंधन की मास्टरक्लास बन गया. स्टेडियम स्थानीय गणमान्य लोगों और सोशलाइट्स से भर दिया गया, जिन्होंने दृश्य पूरी तरह बाधित कर दिया, जबकि टिकटधारी फैंस को वीआईपी गाला देखने के लिए मजबूर कर दिया गया. मेसी लगातार उन लोगों की परतों के पीछे छिपे रहे, जिनका खेल से कोई सरोकार नहीं था. कई फैंस के लिए यह “ऐतिहासिक पल” सिर्फ़ सूटों की पीठ और हवा में उठे मोबाइल फ़ोनों को देखने तक सीमित रह गया.
मुंबई में मिट्टी पलीद
मेसी के दौरे का सबसे खतरनाक पल मुंबई में आया,जब दर्शकों का सब्र टूट गया. फेलिसिटेशन समारोह के दौरान जब अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को मंच पर लाया गया, तो उन्हें ज़ोरदार और लगातार हूटिंग का सामना करना पड़ा. करीना कपूर भी नहीं बचीं. यह व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी, यह सार्वजनिक विरोध था. फैंस एक साफ़ संदेश दे रहे थे, यह फ़िल्म लॉन्च नहीं है, यह ब्रांड इवेंट नहीं है, यह फुटबॉल है. पहली बार दर्शकों ने बनावटी श्रद्धा के खेल में शामिल होने से इनकार कर दिया. बॉलीवुड सितारों, नेताओं और कॉरपोरेट प्रमुखों को मेसी के साथ सेल्फ़ी चाहिए थी, तो उन्हें यह निजी तौर पर करनी चाहिए थी. कुछ कॉरपोरेट लीडर्स ने यही किया शांत, निजी मुलाक़ातें, स्टेडियम से दूर, बिना फैंस से उनका पल छीने यही ज़िम्मेदार तरीके से पहुँच संभालना होता है. सार्वजनिक स्टेडियम वीआईपी ड्रॉइंग रूम नहीं होते. वे उन फैंस के होते हैं जिन्होंने पैसे दिए, इंतज़ार किया और सच में परवाह की.
दिल्ली में निकला दम
दिल्ली चरण ने इस disconnect को और उजागर किया. जब राजधानी ज़हरीली स्मॉग से जूझ रही थी और नागरिकों को बाहर निकलने से बचने की सलाह दी जा रही थी, तब हाई-प्रोफ़ाइल आउटडोर इवेंट्स पर ज़ोर देना कम से कम असंवेदनशील और ज़्यादा से ज़्यादा गैर-जिम्मेदाराना था.लेकिन ऑप्टिक्स हक़ीक़त से ज़्यादा अहम थे. घोषणाएँ हवा से ज़्यादा ज़रूरी थीं, जब तक फोटो मिल जाए, बैकड्रॉप मायने नहीं रखता था.
ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिंद्रा ने कहा कि किसी दिग्गज के क़रीब जाने, तस्वीरें लेने और क्षणिक पहुँच के लिए करोड़ों खर्च किए गए यह सोचकर मन में एक ख़ामोश उदासी आती है कि अगर इसी ऊर्जा का थोड़ा सा हिस्सा भी खेल की बुनियाद पर लगाया जाता, तो क्या कुछ संभव हो सकता था.
फुटबॉल संस्कृति पर भारी सत्ता संस्कृति
इस दौरे की सच्चाई का सबसे शालीन बयान है एक विशाल, निरर्थक बर्बादी. उद्देश्य पूरी तरह, पूरी तरह से विफलयह यात्रा युवा फुटबॉलरों को प्रेरित कर सकती थी. यह अकादमियों, बुनियादी ढांचे और ग्रासरूट ज़रूरतों को उजागर कर सकती थी. यह कुछ मायने रख सकती थी लेकिन इसके बजाय, यह भारतीय अभिजात्य मानसिकता का केस स्टडी बन गई जहाँ पहुँच,योग्यता से ऊपर है; दृश्यता, मूल्य से ऊपर है; और वीआईपी पास, फैन से हमेशा ऊपर. मेसी विनम्रता के साथ आए और वे अपनी गरिमा के साथ लौटे लेकिन जिस सिस्टम ने उनकी मेज़बानी की, उसके बारे में यह नहीं कहा जा सकता. G.O.A.T भारत आया था।उसे फुटबॉल संस्कृति नहीं, सत्ता संस्कृति मिली.