कहते हैं पढ़ाई जरूरी है, लेकिन सिर्फ पढ़ाई ही सफलता की गारंटी नहीं होती. मेहनत, ईमानदारी और सही सोच हो तो बिना बड़ी डिग्री के भी इंसान अपनी पहचान बना सकता है. खंडवा के शुभम तिरोले की कहानी इसी बात का जीता-जागता उदाहरण है. दसवीं में फेल होने के बाद जिस युवक के पास कोई रास्ता नहीं दिख रहा था, आज वही युवक अपने फल के कारोबार से हर महीने करीब 50 हजार रुपये कमा रहा है.
शुभम तिरोले खंडवा के रहने वाले हैं, करीब 7 साल पहले हालात ऐसे थे कि घर की जिम्मेदारी सिर पर थी, पढ़ाई में मन नहीं लग पाया और दसवीं में फेल हो गए. घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए पढ़ाई छोड़कर काम करना मजबूरी बन गई. शुरुआत में उन्होंने एक गाड़ी के शोरूम में काम किया, जहां उनका काम गाड़ी धोने का था. उस वक्त उन्हें सिर्फ 2500 रुपये महीने की तनख्वाह मिलती थी. इतने पैसों में घर चलाना बहुत मुश्किल था, लेकिन शुभम ने हिम्मत नहीं हारी.
LOCAL 18 से बातचीत में शुभम बताते हैं कि नौकरी करते हुए भी उनके मन में यही चलता रहता था कि आगे क्या किया जाए, जिससे आमदनी बढ़े और अपना कुछ हो. धीरे-धीरे उनकी सैलरी बढ़कर 9 हजार रुपये तक पहुंची. तब उन्हें लगा कि अब कुछ खुद का करने की सोच सकते हैं. नौकरी छोड़ने का रिस्क तुरंत नहीं लिया, लेकिन दिमाग में अपना काम शुरू करने का प्लान तैयार कर लिया.
एक दिन उन्होंने फल का ठेला लगाने का फैसला किया. किराए पर ठेला लिया और अपनी बचत से करीब 8 हजार रुपये के फल खरीदे. शुरुआत में सेब, केला, चीकू, अनार और नारियल पानी जैसे फल रखे. शुभम का एक ही नियम था क्वालिटी से कभी समझौता नहीं करना. चाहे मुनाफा कम हो जाए, लेकिन ग्राहक को खराब फल नहीं देना.
धीरे-धीरे लोगों को शुभम की दुकान पसंद आने लगी. फल ताजे होते थे, रेट ठीक रहते थे और व्यवहार भी अच्छा था. इसी वजह से ग्राहक बढ़ते चले गए. कुछ समय बाद शुभम ने फलों की वैरायटी और बढ़ा दी. अब हर तरह के फल उनकी दुकान पर मिलने लगे. काम बढ़ा तो उन्होंने एक नहीं, बल्कि दो ठेले खरीद लिए और दुकान को और बड़ा कर लिया.
आज शुभम की दुकान लेडी बटलर हॉस्पिटल पड़वा के पास है और उन्हें इस जगह पर काम करते हुए 7 साल हो चुके हैं. उनकी पहचान एक भरोसेमंद फल विक्रेता के रूप में बन चुकी है. कई ग्राहक ऐसे हैं जो रोजाना उनसे फल लेते हैं. कुछ ग्राहक तो फोन पर ही ऑर्डर दे देते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि यहां क्वालिटी मिलेगी.
इस कारोबार से शुभम ने न सिर्फ घर चलाया, बल्कि इसी कमाई से अपनी शादी भी की. धीरे-धीरे पैसे जोड़कर उन्होंने अपने गांव मलगांव में खुद का पक्का मकान बनाया. आज उनके घर में सारी सुविधाएं हैं और वह एक बेटे के पिता भी बन चुके हैं.
शुभम कहते हैं कि कोई भी काम छोटा नहीं होता. अगर आज वह नौकरी में होते तो शायद 15 से 20 हजार रुपये ही कमा पाते, लेकिन अपने फल के बिजनेस से वह 50 से 55 हजार रुपये महीने तक कमा लेते हैं. रोज की कमाई करीब 1500 रुपये हो जाती है. सबसे बड़ी बात यह है कि यह उनका खुद का काम है और उन्हें किसी का दबाव नहीं झेलना पड़ता.
आखिर में शुभम यही कहते हैं कि काम करने का जज्बा होना चाहिए. मेहनत हर काम में है, लेकिन ईमानदारी और धैर्य से किया गया छोटा काम भी बड़ी सफलता दिला सकता है. उन्होंने अपने बच्चों के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर दिया है, जिसे आगे बढ़ाने का मौका आने वाली पीढ़ी के पास रहेगा.