Balaghat News. बालाघाट भले ही लाल आतंक से मुक्त हो चुका है, लेकिन उसके दिए जख्म अब भी ताजे हैं. नक्सलियों ने कई ऐसी घटनाओं को अंजाम दिया, जिसने किसी के पति को छीना तो किसी बच्चे के सिर से पिता का साया. एक ऐसी वारदात नक्सलियों ने आज से ठीक 26 साल पहले दी थी, जिसमें नक्सलियों ने एक मंत्री को मौत के घाट उतारा हो. जी हां, हम आपको वही एक दर्दनाक किस्सा बता रहे हैं, जिसमें नक्सलियों ने तब के वन एवं परिवहन मंत्री लिखीराम कावरे की निर्मम हत्या कर दी थी.
साल 1990 में बालाघाट में शुरू हुई सशस्त्र क्रांति साल 1999 तक आते-आते अपने पांव जमा चुकी थी. लोगों में इतना खौफ था कि कोई उनके खिलाफ बोलने से पहले भी सौ बार सोचता था. नक्सलियों के हौंसले भी सातवें आसमान पर थे. ऐसे में अपनी धमक दिखने के लिए उन्होंने एक कायराना हरकत को अंजाम दिया. उन्होंने तत्कालीन मंत्री लिखीराम कावरे की हत्या कर दी थी.
सिर्फ घर जलाना था, मिल गए मंत्री जी
उसी साल आंध्र प्रदेश में नक्सलियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई हुई थी, जिसमें नक्सलियों के तीन बड़े नेता मारे गए थे. नक्सलियों ने उसी का बदला लेने की ठानी थी. नक्सली उस दिन मंत्री जी का घर जलाकर अपनी धमक दिखाना चाहते थे लेकिन इत्तेफाक से लिखीराम कावरे घर पर मौजूद थे और नक्सलियों को एक बड़ा मौका मिल गया. नक्सलियों एक ऐसी घटना को अंजाम दिया, जिससे न सिर्फ बालाघाट दहला बल्कि पूरे देश में हड़कंप मच गया. ये ऐसा पहला मौका था जब नक्सलियों ने किसी मंत्री को निशाना बनाया हो.
सबसे पहले जानिए कैसी की थी वो प्लानिंग
नक्सलियों ने किरनापुर से लगे गांव सोनपुरी में एक दिन पहले आकर रेकी की थी. वहीं, एक ग्रामीण से मंत्री कावरे और उनके घर की पूरी जानकारी ले ली थी. नक्सलियों ने उसी गांव से एक व्यक्ति के हाथ से दो कॉपियों, साबुन, नारियल तेल, तिरपाल, टॉर्च के सेल और माचिस खरीदवाई थी. वहीं, जब नक्सली उनके घर पहुंचे तो सबसे पहले उन्होंने टेलीफोन की लाइन काट दी.
अब जानिए उस खौफनाक रात की कहानी
साल था 1999 और समय 15 और 16 दिसंबर की दरमियानी रात करीब दर्जन भर नक्सली मंत्री लिखीराम कावरे के गांव सोनपुरी पहुंचते हैं. तब वह एक दरवाजा खटखटाते हैं और कहते मंत्री लिखीराम कावरे कहां है. उनके भाई लिखनलाल बताते हैं कि बाजू वाले कमरे में सो रहे हैं. उनके भाई को सोने की नसीहत देते हैं और उन्हें कमरे में बंद कर देते हैं. वहीं, दूसरे कमरे की ओर बढ़ते हैं और दरवाजा खटखटाते हैं, तब गहरी नींद से उठे मंत्री कावरे दरवाजा खोलते हैं. जैसे ही वह दरवाजा खोलते हैं वह समझ नहीं पाते की हो क्या रहा है. इससे पहले ही माओवादी उन्हें घसीटकर सड़क की ओर लाते हैं. ऐसे में उनकी एक चप्पल गेट पर अटक जाती है और उन्हें सड़क पटक दिया जाता है.
इसके बाद माओवादी लोगों को जगाते हैं और उनसे शिनाख्त करते हैं. बताया जाता है कि उन्होंने कावरे के चेहरे पर टॉर्च की लाइट मारी फिर ग्रामीणों से पुछा कि ये कौन है तब ग्रामीणों ने बताया ये मंत्री जी हैं. तब अगले ही पल एक नक्सली ने कुल्हाड़ी से उनपर वार किया और उनकी वहीं पर मौत हो गई. ग्रामीण आज भी उस रात को याद कर सहम जाते हैं. बतातें है कि जब माओवादी वहां से लौट रहे थे तो जोर-जोर से नारे लगा रहे थे कि लिखीराम कांवरे मुर्दाबाद और कामरेड जिंदाबाद… अपनी मौजदूगी के तौर नक्सलियों ने कुछ पर्चे भी फेंके थे.
अगले दिन सुबह न सिर्फ गांव में हल्ला था बल्कि पूरे प्रदेश में हल्ला मचा. तब उनका परिवार भोपाल में था. उनकी पत्नी पुष्पलता कांवरे अपने तीनों बच्चों को हेलीकॉप्टर से किरनापुर लाया गया. उस घटना के बाद तमाम नेता उनके घर आए थे.
इधर अंतिम संस्कार, उधर चिकन पार्टी
जब मंत्री लिखीराम कावरे के अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही थी. तब नक्सली दूसरी तरफ महज 10 किलोमीटर दूर बकरा पार्टी की तैयारी कर रह थे. एक ग्रामीण को धमकाया और 300 रुपए देकर बकरा खरीदा और जंगल जाकर बकरा खाकर जश्न मनाया. नक्सलियों ने अपने साथ एक फोटो एल्बम, कार्डलेस फोन और मंत्री जी का चश्मा भी लेकर आए थे.
26 साल बाद उस घटना को याद कर परिवार सहम जाता है. लिखीराम कावरे की बेटी हिना कावरे कहती है, जो हमारे परिवार ने सहा वो दुश्मन के साथ भी न हो.
दर्जन भर नक्सली थे शामिल
इस मामले में दर्जन भर नक्सली शामिल थे. वारदात का मास्टरमाइंड सूरज टेकाम था, जिसे अब तक गिरफ्तार नहीं किया जा सका. इस मामले में भैयालाल, चैतराम उर्फ ताराचंद, माखन उर्फ अर्जुन, ललीता उर्फ पार्वती, मदनलाल वरखड़े, संतोष, रुकमा बाई और झिनीया बाई पर मामला चला. लेकिन सबूतों के अभाव में हाईकोर्ट से बरी हो गए. भले ही सरकार दावा करती है कि नक्सलवाद बालाघाट मुक्त हो चुका है लेकिन ऐसा न्याय नहीं मिल पाया, जो माओवादियों के दिए जख्मों को भर सके.