जब भी बालाघाट जिला का नाम आता है, तो अधिकतर लोगों के दिमाग में नक्सलवाद की तस्वीर उभरती है. लेकिन सच्चाई यह है कि बालाघाट सिर्फ नक्सल प्रभावित इलाका नहीं, बल्कि खनिज, जंगल, खेती और ऐतिहासिक विरासत का भी बड़ा केंद्र रहा है.
मैंगनीज और तांबा जैसे खनिज हों, धान की खेती हो या फिर घने जंगल बालाघाट की पहचान काफी व्यापक है. अब यह जिला 158 साल का हो चुका है, वहीं इसके नाम बदले जाने को भी 130 साल पूरे हो चुके हैं.
1867 में कैसे हुआ जिले का निर्माण
आज से 158 साल पहले बालाघाट जैसा कोई जिला अस्तित्व में नहीं था. यह पूरा क्षेत्र उस समय सेंट्रल प्रोविंस बरार (CP Berar) के अंतर्गत आता था. साल 1867 में प्रशासनिक जरूरतों को देखते हुए महाराष्ट्र के भंडारा जिले के कुछ हिस्से, मध्य प्रदेश के मंडला और सिवनी जिले के कुछ क्षेत्रों को मिलाकर एक नया जिला बनाया गया. उस समय इस जिले का नाम ‘बुढ़ा’ रखा गया था. इस नवगठित जिले के पहले कलेक्टर कैप्टन जे. एल. लोच नियुक्त किए गए थे.
बालाघाट के नाम बदलने की कहानी
जिले का नाम 1895 में बदला गया. यानी करीब 28 साल बाद बुढ़ा का नाम बदलकर बालाघाट कर दिया गया. नाम बदलने के पीछे बड़ा कारण यहां की भौगोलिक बनावट थी. इस इलाके में कुल 12 प्रमुख घाट पाए जाते हैं, जिनमें मासेन घाट, कंजई घाट, रणराम घाट, बस घाट, डोंगरी घाट, सेलन घाट, भिसाना घाट, सालेटेरी घाट, डोंगरिया घाट, कवारगढ़ घाट, अहमदपुर घाट और तेपागढ़ घाट प्रमुख हैं. इन्हीं घाटों के कारण पहले नाम ‘बारहघाट’ प्रस्तावित किया गया, लेकिन समय के साथ उच्चारण बदलता गया और नाम बन गया बालाघाट. जब नाम बदला गया, उस समय जिले के कलेक्टर एस.एम. चिटनाविस थे.
ऐतिहासिक धरोहरें, लेकिन संरक्षण की कमी
बालाघाट की ऐतिहासिक पहचान भी बेहद समृद्ध रही है. 1995 में बालाघाट नामकरण शताब्दी वर्ष मनाया गया था, जिसमें तत्कालीन कलेक्टर भूपाल सिंह, आकाशवाणी निदेशक शंशाक और नगर पालिका अध्यक्ष भीम फुलसुंधे की अहम भूमिका रही. इतिहासकारों के अनुसार अंग्रेज सरकार ने 1914 में 6 स्थलों को संरक्षित किया था. बाद में राज्य सरकार ने 1988 में हट्टा बावली और 2019 में धनसुआ गोंसाई मंदिर को संरक्षित घोषित किया.
हालांकि आज हालत यह है कि जिले के वन क्षेत्रों में बिखरी कई पुरातात्विक धरोहरें उपेक्षा, अव्यवस्था और चोरी की वजह से अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं.
जंगल और खनिज का खजाना है बालाघाट
बालाघाट जिले का करीब 53 प्रतिशत क्षेत्र वन से ढका हुआ है. यहां साल, सागौन, बेहड़ा, तेंदू, हर्रा जैसे कीमती वृक्ष पाए जाते हैं. यही वजह है कि जिले में कान्हा नेशनल पार्क और सोनेवानी कंजर्वेशन जैसे क्षेत्र मौजूद हैं. इसके साथ ही मैंगनीज और तांबा जैसे खनिजों से सरकार को भारी राजस्व भी प्राप्त होता है.
नक्सल से आगे भी है बालाघाट
कुल मिलाकर बालाघाट सिर्फ नक्सलवाद की पहचान नहीं, बल्कि इतिहास, प्रकृति, खनिज और संस्कृति का संगम है. जरूरत है तो बस इसकी विरासत को सहेजने और सही पहचान दिलाने की.