जिले के जलाशयों के पास दिखे दुर्लभ प्रजातियों के पक्षी।
वन विभाग ने लुप्त हो रही पक्षियों की प्रजातियों के संरक्षण के लिए एक पहल शुरू की है। इसके तहत पक्षियों की गणना की जा रही है, जिससे उन प्रजातियों की पहचान की जा सके जिनकी संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। इस कवायद का उद्देश्य संख्या घटने के कारणों का पत
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एक समय बहुतायत में दिखने वाली गौरैया चिड़िया की संख्या में अब भारी कमी आई है, और यह सीमित स्थानों तक सिमट गई है। इसी तरह, कई अन्य पक्षी प्रजातियां भी लुप्त होने की कगार पर हैं, जो पहले आसानी से दिख जाती थीं। वन विभाग इस गिरावट के कारणों का पता लगाने के लिए प्रयासरत है।
इन कारणों में नदी किनारे बढ़ते प्रदूषण, चायना डोर का उपयोग और मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन प्रमुख हैं, जिन्होंने कई पक्षियों से उनके प्राकृतिक आवास छीन लिए हैं और उनकी प्रजातियों को प्रभावित किया है। विभाग यह पता लगा रहा है कि कौन सी प्रजातियां प्रभावित हुई हैं और उनकी वर्तमान संख्या क्या है।
पृथ्वी पर मौजूद पेड़ों के विकास में पक्षियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर, वन विभाग अब पर्यावरण प्रदूषण को रोकने और पक्षियों को उनका प्राकृतिक आवास पुनः प्रदान करने के उद्देश्य से यह गणना कर रहा है।
शाजापुर के डैम पर विचरण करती पक्षी।
यहां मिली 64 प्रजातियां
वन विभाग की प्रारंभिक खोज में अब तक विभिन्न स्थानों पर पक्षियों की प्रजातियां दर्ज की गई हैं। आगर में 19 प्रजातियां, कालीसिंध नदी (सुसनेर के पास) में 10 प्रजातियां और शाजापुर के चीलर और लखुंदर डैम के पास 64 प्रजातियां पाई गई हैं।
इनमें शाजापुर जिले के पलसवाद सोन के लखुंदर डेम पर एक विलुप्तप्राय पक्षी ‘सवाना नाइटज़ार’ (डाब चिड़ी) भी देखा गया है। वन विभाग द्वारा इन सभी आंकड़ों को एकत्रित कर एक ऐप पर अपलोड किया जाएगा। इस डेटा के आधार पर, विभाग पक्षियों के संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा के लिए ठोस योजनाएं बनाएगा।

पक्षियों की गणना करती टीम।
विलुप्त हो रहीं प्रजातियों के कदम उठाएंगे
डीएफओ शाजापुर हेमलता शाह ने कहा की वन विभाग का एशियन बर्ड सेंसस चल रहा है। इसमें पक्षियों की वाचिंग की जा रही है। कौन से पक्षी विलुप्त होते जा रहे हैं और इसके पीछे क्या कारण है। इसके लिए एप्प है उस पर इनका डाटा एकत्रित कर डाला जाएगा। इसके बाद इनके संरक्षण के लिए कदम उठाए जाएंगे।