Lalbagh Palace History: इंदौर के कलेक्टर कार्यालय से महू नाका की तरफ जाते हुए एक विशाल गेट दिखता है, जो लंदन के बकिंघम पैलेस जैसा है. इस गेट से अंदर जाते ही धूप में चमकता सफेद संगमरमर का आलीशान महल नजर आता है, जिसे लालबाग पैलेस के नाम से जाना जाता है. यह महल होलकर राजवंश की शान-ओ-शौकत और उनके आधुनिक नजरिए की जीती-जागती मिसाल है. यहां आपको भारतीय और यूरोपीय दोनों शैली साफ दिखाई पड़ती है.
लालबाग पैलेस की हर एक चीज बड़ी बारीकी से बनाई गई है. इटालियन मार्बल लगाया गया है. पैरिस से लोहे के गमले लाए गए थे, जो आज भी पैलेस के दरवाजे पर पर्यटकों का उसी गर्मजोशी से स्वागत कर रहे हैं. होलकर स्ट्रीट का रंग-बिरंगा चिन्ह हो या फिर तुकोजी राव होल्कर का TRH लिखा स्पेशल सिग्नेचर, हर एक चीज आकर्षित करती है. यहां एंट्री करते ही आम दरबार दिखाई पड़ता है, जिसमें सोने के पानी का इस्तेमाल कर नक्काशी की गई है.
लंदन से आया था गेट
महल का मुख्य गेट लंदन के ‘बकिंघम पैलेस’ के गेट की नकल है. इसे इंग्लैंड में ही कास्ट किया गया था. समुद्री रास्ते से भारत लाया गया था. इस पर होलकर राजवंश का राजचिह्न बना है. महल के अंदर घुसते ही आपको ऐसा लगेगा जैसे आप पेरिस के किसी महल में आ गए हों. यहां के फर्श इटैलियन मार्बल के हैं, तो दीवारों पर की गई नक्काशी और पेंटिंग्स बेल्जियम और फ्रांस की हैं.
झूमर की खासियत गजब
हॉल में मौजूद झूमर देखकर आपकी आंखें खुली रह जाएंगी. कहा जाता है कि इन झूमरों की चमक से पूरा हॉल सोने की तरह दमक उठता था. आज भी यह लाइट से गुलजार रहता है. छत पर की गई ‘प्लास्टर ऑफ पेरिस’ की कलाकारी और उस पर सोने की परत देखकर लगेगा कि यह उस समय कैसे संभव हुआ होगा. छत पर इतनी सुन्दर पेंटिंग आपके जहन में रह जाती है.
भोजन ठंडा न हो इसलिए लिफ्ट
होलकर वंश के राजा-महाराजा मेहमानी के शौकीन थे. अपने यहां आए मेहमानों के लिए एक खास हॉल तैयार किया गया था, जिसमें दर्जनों लोग एक साथ भोजन कर सकते थे. भोजन नीचे से ऊपर लाने में ठंडा हो जाता था, इसलिए खासतौर पर लिफ्ट लगाई गई थी, जो आज भी यहां देखी जा सकती है. उस दौर में इस पैलेस में पाइपलाइन और लाइटिंग्स को बेहतरीन तरीके से सजाया गया था, जो दर्शाता है कि तुकोजीराव तकनीक का भरपूर इस्तेमाल करना जानते थे.
तीन पीढ़ियों ने बनाया
लालबाग पैलेस का निर्माण एक-दो साल में नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियों के कालखंड में पूरा हुआ. इसकी नींव महाराजा तुकोजीराव होलकर द्वितीय ने 1886 में रखी थी. इसके बाद महाराजा शिवाजीराव होलकर ने काम आगे बढ़ाया, लेकिन इसे असली भव्यता और अंतिम रूप महाराजा तुकोजीराव होलकर तृतीय के शासनकाल में मिला. 1921 में जाकर यह महल पूरी तरह बनकर तैयार हुआ. 1978 तक महाराज खुद इसमें निवास करके थे. बाद में सरकार ने खरीद लिया और 1988 से ही इसे पर्यटकों के लिए खोल दिया गया था.
ऐसे नाम पड़ा लालबाग पैलेस
एक समय में इस पैलेस के चारों ओर गुलाब के फूल हुआ करते थे, जिस वजह से पूरा क्षेत्र लाल नजर आता था. तभी से इसे लालबाग पैलेस कहा जाने लगा. रोजाना लालबाग में करीब हजार पर्यटक घूमने आते हैं. इसमें ज्यादातर महाराष्ट्र, गुजरात और विदेश के पर्यटक रहते हैं. आप भी मात्र 25 रुपए का टिकट लेकर लालबाग पैलेस की खूबसूरती का आनंद ले सकते हैं.