मजदूरी करने वाली मां की बेटी बनी कुश्ती की शेरनी, खंडवा की नेहा ने हौसले से रचा सफलता का अखाड़ा

मजदूरी करने वाली मां की बेटी बनी कुश्ती की शेरनी, खंडवा की नेहा ने हौसले से रचा सफलता का अखाड़ा


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Khandwa News: घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण नेहा और उनकी मां मिलकर घर चलाती है. मां मजदूरी करती है और नेहा सिलाई का काम करती है. पढ़ाई, कुश्ती और काम तीनों को एक साथ संभालते हुए नेहा आगे बढ़ रही है. नेहा ने गांव के श्रीकृष्ण व्यायाम शाला अखाड़े से कुश्ती की शुरुआत की थी. इसके बाद भोपाल के तात्या टोपे स्टेडियम में प्रशिक्षण लिया.

खंडवा जिले के एक छोटे से गांव की बेटी ने यह साबित कर दिया है कि अगर हौसला मजबूत हो तो गरीबी, संसाधनों की कमी और मुश्किल हालात भी रास्ता नहीं रोक सकती. यह कहानी है बोरगांवखुर्द गांव की नेहा कनाडे की. जिसने कुश्ती के अखाड़े से निकलकर जिले और मध्य प्रदेश का नाम रोशन किया है. नेहा एक गरीब परिवार से आती है. पिता सीताराम कनाडे साधारण व्यक्ति है और मां मजदूरी कर परिवार का पेट पालती है. आर्थिक तंगी के बावजूद उनकी मां ने अपनी बेटी के सपनों को मरने नहीं दिया. उन्होंने खुद मजदूरी कर नेहा की कुश्ती की तैयारी करवाई और आज नेहा कई मेडल जीतकर गांव की पहचान बन चुकी है.

LOCAL 18 से बातचीत में नेहा कनाडे बताती है कि वह एमए हिंदी साहित्य की पढ़ाई कर रही है और बचपन से ही कुश्ती का शौक रखती है. उन्होंने आठवीं कक्षा से कुश्ती शुरू की थी. शुरुआत गांव के दंगलों से हुई. इसके बाद उन्होंने जिला प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा दिखाई. नेहा ने ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी प्रतियोगिता में भाग लिया और कई बार राष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया. खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स के लिए भी उनका चयन हुआ था. जहां उन्हें कुलपति द्वारा वरिष्ठ खेल सम्मान से सम्मानित किया गया.

नेहा बताती है कि खेल के दौरान उन्हें कई बार गंभीर चोटें भी आईं. लगभग एक साल पहले पैर में गंभीर चोट लगने के कारण ऑपरेशन कराना पड़ा, जिसकी वजह से उन्हें एक साल तक कुश्ती से दूर रहना पड़ा. इसके बावजूद उनका हौसला कमजोर नहीं पड़ा.

घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण नेहा और उनकी मां मिलकर घर चलाती है. मां मजदूरी करती है और नेहा सिलाई का काम करती है. पढ़ाई, कुश्ती और काम तीनों को एक साथ संभालते हुए नेहा आगे बढ़ रही है. नेहा ने गांव के श्रीकृष्ण व्यायाम शाला अखाड़े से कुश्ती की शुरुआत की थी. इसके बाद भोपाल के तात्या टोपे स्टेडियम में प्रशिक्षण लिया.

नेशनल खेलने के बाद उनका चयन लखनऊ के उत्कृष्ट कुश्ती केंद्र में हुआ. जहां सरकार की ओर से प्रशिक्षण, किट और डाइट की सुविधा मिली. खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी प्रतियोगिता में तीन मुकाबले जीतने के बाद उन्हें चोट लग गई. जिससे वह मेडल नहीं जीत सकी. लेकिन वहां तक पहुंचना ही उनकी मेहनत की बड़ी उपलब्धि है.

नेहा का सपना सिर्फ कुश्ती तक सीमित नहीं है. वह आगे चलकर एमपीपीएससी की परीक्षा देकर एसडीएम या कलेक्टर बनना चाहती है. उनका कहना है कि अगर हालात साथ दे तो वह देश के लिए मेडल जीतना चाहती है और साथ ही पढ़ाई में आगे बढ़कर अपने गांव और जिले का नाम रोशन करना चाहती है. नेहा कनाडे की यह कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि उस मां की भी है जिसने मजदूरी कर बेटी के सपनों को सींचा. यह कहानी सच में साबित करती है कि म्हारी छोरिया छोरो से कम नहीं होती.

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खंडवा की नेहा ने हौसले से रचा सफलता का अखाड़ा, कुश्ती में बनाई पहचान



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