कार के बेस मॉडल से टॉप मॉडल की कीमत क्यों होती है इतनी ज्यादा? कौन सा वेरिएंट खरीदना है सबसे फायदेमंद

कार के बेस मॉडल से टॉप मॉडल की कीमत क्यों होती है इतनी ज्यादा? कौन सा वेरिएंट खरीदना है सबसे फायदेमंद


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एक ही कार के बेस और टॉप मॉडल की कीमत में जमीन-आसमान का अंतर देखकर अक्सर खरीदार उलझन में पड़ जाते हैं. आखिर वह क्या है जिसके लिए कंपनियां 5 से 10 लाख रुपये तक ज्यादा वसूलती हैं? क्या यह सिर्फ सनरूफ और बड़ी स्क्रीन का खेल है या इसके पीछे इंजन और सेफ्टी का कोई बड़ा गणित है? इस लेख में जानिए कीमतों के इस बड़े अंतर का असली कारण और वह ‘गोल्डन रूल’ जो आपको बताएगा कि आपके बजट और जरूरत के हिसाब से कौन सा वेरिएंट सबसे ज्यादा Value for Money है.

जब हम किसी कार का विज्ञापन देखते हैं, तो उसकी शुरुआती कीमत (Base Price) बहुत लुभावनी लगती है. लेकिन जैसे ही हम शोरूम जाकर अपनी पसंद के फीचर्स वाला ‘टॉप मॉडल’ चुनते हैं, वह कीमत अचानक 4 से 8 लाख रुपये तक बढ़ जाती है. कई बार तो टॉप मॉडल की कीमत बेस मॉडल से दोगुनी तक होती है. आखिर एक ही कार, एक ही चेसिस और एक ही नाम होने के बावजूद कीमतों में इतना बड़ा फासला क्यों होता है? और एक समझदार ग्राहक के लिए कौन सा वेरिएंट चुनना सबसे सही है? आइए विस्तार से समझते हैं.

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ज्यादातर मामलों में बेस मॉडल में एक साधारण ‘नैचुरली एस्पिरेटेड’ (NA) इंजन होता है, जबकि टॉप मॉडल में अधिक पावरफुल टर्बो इंजन दिया जाता है. इसके अलावा, बेस वेरिएंट अक्सर केवल मैनुअल गियरबॉक्स के साथ आता है, जबकि टॉप वेरिएंट में ऑटोमैटिक (AMT/DCT/CVT) का विकल्प मिलता है जिसकी लागत काफी अधिक होती है.

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आजकल की नई कारों में सुरक्षा केवल एयरबैग्स तक सीमित नहीं है. टॉप मॉडल्स में ADAS (लेन कीप असिस्ट, ऑटो इमरजेंसी ब्रेकिंग), 360-डिग्री कैमरा, टायर प्रेशर मॉनिटरिंग सिस्टम (TPMS) और 6 एयरबैग्स जैसे फीचर्स मिलते हैं, जो कार की लागत को लाखों में बढ़ा देते हैं.

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सनरूफ, वेंटिलेटेड सीट्स, एम्बिएंट लाइटिंग, बड़ी टचस्क्रीन, प्रीमियम साउंड सिस्टम और लेदरेट इंटीरियर—ये वो चीजें हैं जो कार को आलीशान बनाती हैं. इन प्रीमियम आइटम्स के लिए कंपनियां मोटा मुनाफा (Profit Margin) भी वसूलती हैं.

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बेस मॉडल में साधारण स्टील रिम्स और हैलोजन बल्ब होते हैं. वहीं टॉप मॉडल में डायमंड कट अलॉय व्हील्स, LED हेडलाइट्स, और क्रोम फिनिश दी जाती है, जो कार के लुक को पूरी तरह बदल देती है.

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भारत में इंजन क्षमता और फीचर्स के हिसाब से टैक्स स्लैब बदल जाते हैं. अगर टॉप मॉडल में बड़ा इंजन या ज्यादा लंबाई है, तो उस पर लगने वाला टैक्स भी बेस मॉडल से अधिक होता है.

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विशेषज्ञों और मार्केट ट्रेंड्स के अनुसार, ‘मिड वेरिएंट’ (Mid-Variant) या ‘सेकंड-टॉप’ मॉडल खरीदना सबसे अधिक फायदे का सौदा होता है.

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मिड वेरिएंट में अक्सर वो सभी जरूरी फीचर्स (जैसे- टचस्क्रीन, रिवर्स कैमरा, स्टीयरिंग कंट्रोल और अलॉय व्हील्स) मिल जाते हैं जिनकी असल में जरूरत होती है.

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कार के बेस मॉडल से टॉप मॉडल की कीमत क्यों होती है इतनी ज्यादा?



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