गांव से ग्लोबल! समूह ने बांस को दिलाई लग्जरी पहचान, विदेशों तक डिमांड

गांव से ग्लोबल! समूह ने बांस को दिलाई लग्जरी पहचान, विदेशों तक डिमांड


सतना. जिस बांस को कभी ग्रामीण इलाकों में केवल टोकरी, मचिया या साधारण घरेलू उपयोग तक सीमित माना जाता था, वही बांस आज लग्जरी और डिजाइनर पहचान बनकर विदेशों तक पहुंच रहा है. पुरानी पद्धति, पारंपरिक कारीगरी और आधुनिक सोच के अनूठे संगम ने यह कर दिखाया है. मध्य प्रदेश के सतना के सोनौरा स्थित वन विश्राम गृह परिसर में संचालित एक स्वयं सहायता समूह और उससे जुड़ी यूनिट ने बांस को साधारण कच्चे माल से निकालकर इंटरनेशनल मार्केट का ब्रांड बना दिया है. इस सफलता की कहानी सिर्फ उत्पादों की नहीं बल्कि सोच, तकनीक और ग्रामीण रोजगार के नए मॉडल की भी है.

इस पूरी पहल की नींव उस समय पड़ी जब बैंबू मिशन के डायरेक्टर ने एक आईआईटियन को बांस आधारित बिजनेस आइडिया पर काम करने का सुझाव दिया. पारंपरिक बांस उत्पादों को नए अंदाज में पेश करने की यह सोच धीरे-धीरे एक मजबूत ब्रांड में बदल गई. नतीजा यह हुआ कि आज चमक-दमक से भरे ढेरों डिजाइनर लैंप, स्टाइलिश फर्नीचर और घर की साज-सज्जा के खूबसूरत सामान पहली नजर में किसी महंगी धातु या कीमती लकड़ी के लगते हैं जबकि वे पूरी तरह बांस से तैयार होते हैं.

लग्जरी फर्नीचर से लेकर बांस की साइकिल तक
इस यूनिट में डिजाइनर लैंप, कुर्सी, सोफा, डाइनिंग टेबल, स्टूल, ट्रे, टोकरी, पेन होल्डर जैसे 50 से अधिक उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं. यही नहीं, बांस से बनी साइकिल भी इस यूनिट की खास पहचान बन चुकी है, जिसे कुछ ही समय में सड़कों पर दौड़ते हुए देखा जा सकेगा. कुछ घंटों के चार्ज से ये 25 किमी की रफ्तार से एक बार में 100 किमी तक का सफर तय कर सकती है. इस साइकिल का फ्रेम धातु के बजाय बांस से बना है, जो हल्का होने के साथ-साथ स्टील जितना मजबूत है. 75 से 80 हजार रुपये की कीमत वाली यह डिजिटल ई-साइकिल बैटरी सिस्टम और आईओटी टेक्नोलॉजी से लैस है. यह मॉडल पूरी तैयार हो चुका है और इसके ऑर्डर भी आने लगे हैं. यहां उत्पादों की कीमत 2500 रुपये से शुरू होकर लाखों रुपये तक जाती है, जो इनके प्रीमियम डिजाइन और क्वालिटी को दर्शाती है.

देश ही नहीं विदेशों तक मांग
इन बांस उत्पादों की मांग अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है बल्कि दुबई, मलेशिया, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे कई देशों तक इनके ऑर्डर पहुंच चुके हैं. वहीं इन देशों में कंपनी के रेगुलर कस्टमर भी तैयार हो चुके हैं. साथ ही देश के भीतर इंदौर, भोपाल, दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों के साथ कई राज्यों में भी इन उत्पादों की अच्छी-खासी मांग है.
कैसे तैयार होते हैं बांस के प्रीमियम प्रोडक्ट?
नर्मदा स्वयं सहायता समूह के अध्यक्ष पुष्पराज वरुण लोकल 18 से बताते हैं कि बांस को पहले कटिंग मशीन से आवश्यक आकार में काटा जाता है. इसके बाद नोड फिनिशिंग मशीन से गांठों को साफ किया जाता है. समानांतर स्प्लिटर से बांस की पट्टियां निकाली जाती हैं और मल्टीपरपज मशीन से उनकी मोटाई तय की जाती है. फिर फोर-साइड प्लेनर से बांस को चारों ओर से एक समान बनाया जाता है और फिनिशर मशीन से बारीक कारीगरी के लिए तैयार किया जाता है. अंत में कुशल कारीगर इन पट्टियों से आकर्षक और टिकाऊ उत्पाद तैयार करते हैं. इन सभी उत्पादों का डिजाइन दिल्ली में कंपनी के ओनर आईआईटियन शशांक गौतम द्वारा तैयार किया जाता है.
स्थानीय रोजगार और आदिवासी महिलाओं को मिला सहारा
इस यूनिट से 30 से 35 स्थानीय कारीगरों को रोजगार मिला है, जिनमें महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल हैं. बिरसिंहपुर, मझगवां और कुआं गांव के कारीगर अपनी पारंपरिक कला को आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़कर नई पहचान बना रहे हैं. कई आदिवासी महिलाएं वर्क फ्रॉम होम के जरिए बांस उत्पाद तैयार कर रही हैं और अपने ऑर्डर यूनिट तक पहुंचाती हैं. बांस की आपूर्ति जिले के हाटी क्षेत्र और असम से की जाती है, जिससे स्थानीय और बाहरी संसाधनों का संतुलित उपयोग हो रहा है.

बड़े प्रोजेक्ट्स और उज्ज्वल भविष्य
अब तक इस यूनिट को अदानी एयरपोर्ट प्रोजेक्ट सहित कई बड़े प्रोजेक्ट्स के ऑर्डर मिल चुके हैं. यह पहल न सिर्फ बांस उद्योग को नई दिशा दे रही है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण का भी मजबूत उदाहरण बनकर उभरी है. बांस से बनी यह कहानी बताती है कि सही सोच तकनीक और मेहनत से गांव से ग्लोबल तक का सफर तय किया जा सकता है.



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