Exclusive: बुनकरों का काम आसान! पहली बार जेकार्ड मशीन से बनाई माहेश्वरी साड़ी

Exclusive: बुनकरों का काम आसान! पहली बार जेकार्ड मशीन से बनाई माहेश्वरी साड़ी


खरगोन. मध्य प्रदेश में खरगोन जिले के ऐतिहासिक नगर महेश्वर में बनने वाली विश्व प्रसिद्ध माहेश्वरी साड़ियां अब तकनीक के नए दौर में प्रवेश कर चुकी हैं. डाबी की मदद से सदियों से हाथों से बुनी जाने वाली इन साड़ियों के लिए महेश्वर में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक जेकार्ड मशीन स्थापित की गई है. इस मशीन के लगने से जहां बुनकरों का काम आसान होगा, वहीं ग्राहकों को बनारसी और चंदेरी साड़ियों की तरह अपनी पसंद की सैकड़ों नई डिजाइनों वाली माहेश्वरी साड़ियां उपलब्ध हो सकेंगी. दरअसल धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान रखने वाला महेश्वर मां नर्मदा के तट पर बसा हुआ है. यह नगर अहिल्याबाई होल्कर की राजधानी भी रहा है. वर्ष 1767 में अहिल्याबाई होल्कर ने स्थानीय लोगों को रोजगार देने के उद्देश्य से हथकरघा उद्योग की नींव रखी थी. शुरुआती दौर में महेश्वर में केवल सूती माहेश्वरी साड़ियां बनाई जाती थीं. इन साड़ियों में प्राकृतिक रंगों का उपयोग होता था. समय के साथ इसमें बदलाव आया और अब रेशम के साथ सोने और चांदी के धागों से भी साड़ियां बुनी जा रही हैं. हालांकि आज भी रंगाई के लिए प्राकृतिक डाई का उपयोग किया जाता है, जो माहेश्वरी साड़ियों को खास पहचान देता है.

माहेश्वरी साड़ियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनकी बुनाई आज भी हैंडलूम पर हाथों से की जाती है. महेश्वर के ऐतिहासिक किले पर बनी नक्काशियां माहेश्वरी साड़ियों की बॉर्डर और पल्लू पर उकेरी जाती हैं. यह डिजाइन साड़ियों को शाही और पारंपरिक लुक देते हैं लेकिन इन जटिल डिजाइनों को तैयार करने में परंपरागत हैंडलूम में डिजाइन बनाने के लिए लकड़ी की डाबी का उपयोग किया जाता है. इसमें पहले कागज पर डिजाइन तैयार किया जाता है, फिर डाबी पर खूंटियां ठोंककर ताने के धागों को नियंत्रित किया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में कई दिन लग जाते हैं. वहीं जेकार्ड मशीन में डिजाइन को कंप्यूटर चिप के जरिए अपलोड कर दिया जाता है और मशीन स्वतः ही साड़ी पर डिजाइन बुन देती है.

महेश्वर में स्थापित हुई 13 जेकार्ड मशीनें
इसी समस्या को देखते हुए शासन द्वारा महेश्वर के बुनकरों को करीब 13 इलेक्ट्रॉनिक जेकार्ड मशीनें उपलब्ध कराई गई हैं. इनमें से पहली मशीन केरियाखेड़ी गांव में लगाई गई है, जहां माहेश्वरी साड़ियों का उत्पादन भी शुरू हो चुका है. इस मशीन से साड़ी बनाने वाले पहले बुनकर अशोक चौहान हैं. वह वर्ष 1997 से माहेश्वरी साड़ियों की बुनाई कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि यह एक इलेक्ट्रॉनिक जैकआउट जेकार्ड मशीन है, जो WAC के माध्यम से उन्हें प्रदान की गई है.

जेकार्ड से काम होगा आसान
अशोक चौहान के अनुसार, इस मशीन की कीमत करीब 4 से 5 लाख रुपये है. इसमें से केवल 10 प्रतिशत राशि बुनकर को देनी होती है जबकि शेष राशि सरकार द्वारा वहन की जाती है. महेश्वर में आई अन्य मशीनें अभी शुरू नहीं हुई हैं लेकिन उनके यहां मशीन पूरी तरह चालू है. इंदौर से WAC द्वारा उपलब्ध कराई गई अलग-अलग कंप्यूटराइज डिजाइनों को मशीन में फीड कर दिया जाता है. इसके बाद मशीन अपने आप साड़ी पर वही डिजाइन चंद मिनटों में बुन देती है.

हर इंच पर बदला जा सकता है डिजाइन
इस मशीन की खासियत यह है कि साड़ी के हर आधा इंच पर भी डिजाइन बदला जा सकता है जबकि पहले हाथों से यह संभव नहीं था. जेकार्ड मशीन के जरिए 500 से ज्यादा डिजाइन माहेश्वरी साड़ियों पर उकेरे जा सकते हैं. यही नहीं, मशीन के जरिए किसी इंसान के चेहरे या किसी चित्र की हूबहू आकृति भी धागों से बेहद बारीकी से कुछ ही मिनटों में बुनी जा सकती है. इससे ग्राहकों को अपनी पसंद के अनुसार विशेष डिजाइन वाली माहेश्वरी साड़ियां मिल सकेंगी.

हाथ की बुनाई रहेगी बरकरार
बुनकर अशोक चौहान का कहना है कि जेकार्ड मशीन केवल डिजाइन बनाने में मदद करती है. साड़ी की बुनाई आज भी हैंडलूम पर हाथों से ही की जाती है. इससे माहेश्वरी साड़ियों की पारंपरिक पहचान पर कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन बुनकरों का काम पहले से अधिक आसान हो जाएगा. नए-नए डिजाइन तैयार होंगे, जिससे मेहनत का बेहतर मूल्य मिल सकेगा, साथ ही माहेश्वरी साड़ी की मांग तेज होगी.



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