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मध्य प्रदेश के उज्जैन में एक ऐसा गांव है, जिसने देशभक्ति की नई मिसाल पेश की है। पूर्व सैनिक गांव में ही युवाओं को ट्रेनिंग देते हैं और उनमें राष्ट्र भावना का संचार करते हैं। गांव ने करीब 800 से ज्यादा सैनिक देश को दिए हैं और इन सैनिकों ने सिर्फ अपने गांव का ही नहीं, बल्कि उज्जैन का भी नाम ऊंचा किया है।
शुभम मरमट/उज्जैन. मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले में स्थित एक ऐसा गांव है, जो देशभक्ति की जीती-जागती मिसाल बन चुका है. यहां हर दूसरा घर सेना से जुड़ा है. 5 हजार से अधिक आबादी वाले इस गांव ने अब तक देश को 800 से ज्यादा सैनिक दिए हैं और इस गांव का नाम कनासिया है. गणतंत्र दिवस से पहले हम आपको ले चल रहे हैं उस गांव की कहानी में, जहां बच्चे, युवा और बुजुर्ग हर किसी की रगों में देशसेवा का जुनून दौड़ता है.
इस गांव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि आज भी यहां वह प्रेरणास्रोत मौजूद है, जिसने अपने दो भाइयों के साथ मिलकर दशकों पहले देशभक्ति की मशाल जलाई. उन्हीं की प्रेरणा से आज भी हर घर से कोई न कोई युवा सेना या अग्निवीर बनकर देश की सेवा में जुट रहा है. कई परिवारों में एक ही घर से दो-दो और तीन-तीन सैनिक हैं. जिन घरों से कोई सैनिक नहीं निकला, वहां कोई शासकीय सेवा में है या विदेश में कार्यरत है. कई जवान आज भी सीमा पर तैनात हैं, तो कई सेवानिवृत्त होकर गांव लौट आए हैं और बच्चों को प्रशिक्षण दे रहे हैं. पूरा गांव एक-दूसरे के लिए प्रेरणा बन चुका है.
उज्जैन से 55 किलोमीटर दूर है कनासिया गांव
उज्जैन जिला मुख्यालय से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर, तराना तहसील में बसा कनासिया गांव देशभक्ति की अनूठी पहचान रखता है. साल 1963 से ही यहां युवाओं में सेना में भर्ती होने का जुनून देखने को मिलता है. कोई थल सेना में गया, तो किसी ने जल और वायु सेना के माध्यम से देश की सेवा की. इस परंपरा की नींव गांव के पहले सैनिक शालाग्राम ने रखी, जिनकी उम्र आज 81 वर्ष है. उनके बाद उनके दोनों भाई सोहन देथलिया और रणछोड़लाल भी सेना में शामिल हुए. तीनों भाइयों ने 1965 और 1971 के युद्धों में साहसपूर्वक भाग लिया और बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के ऐतिहासिक क्षणों के साक्षी बने. सेवा से रिटायर होने के बाद उन्होंने गांव लौटकर युवाओं को सैन्य प्रशिक्षण देना शुरू किया. यह प्रेरणादायी क्रम आज भी जारी है। हालांकि रणछोड़लाल का छह साल पहले निधन हो चुका है, जबकि सोहन देथलिया वर्तमान में उज्जैन में रहते हैं.
गांव में ही मैदान में ही होती है युवाओं की ट्रेनिंग
रिटायर्ड हवलदार अविनाश पटेल बताते हैं कि वे 2003 में सेना में भर्ती हुए और 2025 में स्वेच्छा से सेवानिवृत्त हुए. कोर ऑफ सिग्नल्स और राष्ट्रीय राइफल्स में उन्होंने आतंकवाद विरोधी अभियानों में अहम भूमिका निभाई. अब खेती के साथ-साथ गांव के मैदान में रोज करीब 100 बच्चों को प्रशिक्षण दे रहे हैं. रिटायर्ड हवलदार विनोद पटेल बताते हैं कि गांव में आज भी मूलभूत सुविधाओं की कमी है. बावजूद इसके, युवा अपने स्तर पर मैदान तैयार कर अभ्यास करते हैं. गांव की आस्था के केंद्र सम्मत वाले बाबा हनुमान मंदिर और खोखरा वाले महाराज हैं. यदि शासन-प्रशासन सहयोग करे, तो यह गांव देशभक्ति का नया इतिहास रच सकता है.
खच्चरों से पहुंचाए जाते थे हथियार
शालाग्राम बताते हैं कि 18 वर्ष की उम्र में जब वे सेना में भर्ती हुए, तब 60 रुपए वेतन मिलता था. 15 साल की सेवा के बाद 1978 में वे 300 रुपए मासिक वेतन पर सेवानिवृत्त हुए. उस दौर में ऑस्ट्रेलिया से लाए गए खच्चरों से हथियार पहाड़ों तक पहुंचाए जाते थे. एक खच्चर 12 बंदूकें ढोता था. यही उनका ट्रांसपोर्ट सिस्टम था.
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