नक्सल प्रभावित रहे गांवों के ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बना रही CRPF, ये है प्लान

नक्सल प्रभावित रहे गांवों के ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बना रही CRPF, ये है प्लान


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Balaghat News: सीआरपीएफ ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए तरह-तरह के प्रयास कर रही है. गांववालों को मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है.

बालाघाट. मध्य प्रदेश के बालाघाट पर करीब 35 सालों तक लाल आतंक का साया रहा. ऐसे में नक्सलवाद और सरकार की लड़ाई के बीच प्रभावित इलाकों के लोग पिसते रहे. लोग कभी सरकार तो कभी नक्सलियों की जनताना सरकार से परेशान हुए. यानी कि इतने साल वे डर के साये में अपनी जिंदगी काट रहे थे लेकिन अब पुलिस ने बीते कुछ सालों में अपनी छवि बदली और नक्सल प्रभावित इलाकों के लोगों में सरकार और पुलिस के प्रति भरोसा बढ़ाने का भी काम किया गया. फिर मासूम लोग नक्सलियों के बहकावे नहीं आए और उनकी कोई मदद नहीं की. नतीजतन नक्सलियों का सपोर्ट सिस्टम टूटा और बालाघाट के माथे से नक्सलवाद का 35 साल पुराना कलंक भी मिट गया. अब नक्सलवाद तो खत्म हुआ लेकिन सीआरपीएफ पिछड़े इलाकों में अब भी सक्रिय है. इस बार वह नक्सलियों से नहीं निपट रही है बल्कि आदिवासी समुदाय को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई अनोखे प्रयास कर रही है.

नक्सलवाद के खात्मे के बाद बालाघाट में सीआरपीएफ नक्सल प्रभावित गांवों में कैंप लगा रही है, जिसमें आमजनों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए महिलाओं को सिलाई मशीन और किसानों को मशरूम का बीज उपलब्ध करवा रही है. इतना ही नहीं, ग्रामीणों को खेती की ट्रेनिंग भी दे रही है. लोकल 18 भी बालाघाट से करीब 80 किलोमीटर दूर डाबरी पहुंचा. वहां के ग्रामीणों ने हमें बताया कि उनके गांव के सीआरपीएफ ने सिविक एक्शन प्लान के तहत कैंप आयोजित किया था, जहां पर जवानों ने ग्रामीणों को कई तरह की सामग्री दी. इसमें महिलाओं को सिलाई मशीन दी और किसानों को मशरूम के बीज दिए. इसी के साथ किसानों को मशरूम खेती की ट्रेनिंग भी दी गई.

जवानों की सराहनीय पहल
ग्रामीणों ने लोकल 18 ने बताया कि सीआरपीएफ ने गांव में कैंप आयोजित कर किसानों को मशरूम के बीज मुहैया करवाए. इसी के साथ मशरूम उत्पादन की ट्रेनिंग भी दी गई. इसमें इस्तेमाल होने वाली तमाम सामग्री दी गई. अब ग्रामीण अपने घर में बंद कमरे में इसे उगाएंगे. ऐसा नहीं है कि सिर्फ इसे उगाने की ट्रेनिंग दी जा रही बल्कि इसके विपणन यानी इसकी मार्केटिंग का भी इंतजाम किया है. इसकी मार्केट में कीमत 300 रुपये किलो तक है. वहीं इसे सुखाकर मशरूम पाउडर बनाकर बेचने पर यह एक हजार रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिकता है. ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जवानों की यह सराहनीय पहल है.

नक्सल विचारधारा से उठा भरोसा
जो ग्रामीण सुरक्षाबलों को देख अपने घरों में चले जाते थे, अब नक्सलवाद के खात्मे के बाद वहीं ग्रामीण सुरक्षाबलों से खुलकर बात करते हैं और उन्हें अपनी समस्या बताते हैं. वहीं सुरक्षाबल भी ग्रामीणों से अपनापन दिखाते हैं और उनकी समस्याओं का हल करते हैं. ग्रामीण नक्सल विचारधारा से दूर हुए हैं, साथ ही प्रशासन पर भरोसा भी जता रहे हैं. यह बदले हुए बालाघाट की तस्वीर है.

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Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.

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