कफहर बस्ती और रोहितकाद्य चूर्ण से कम हुआ फैटी लिवर: एक माह तक चला मरीज का इलाज; वजन घटा और रिपोर्ट में भी आया सुधार – Bhopal News

कफहर बस्ती और रोहितकाद्य चूर्ण से कम हुआ फैटी लिवर:  एक माह तक चला मरीज का इलाज; वजन घटा और रिपोर्ट में भी आया सुधार – Bhopal News


हर तीसरा व्यक्ति फैटी लिवर से ग्रसित है। नॉन अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज यानी NAFLD भी तेजी से बढ़ रही है। इस लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारी का कोई सीधा और प्रभावी इलाज मॉडर्न मेडिसिन में मौजूद नहीं है। ऐसे में भोपाल के पं. खुशीलाल शर्मा शासकीय आयुर्वेद कॉल

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इस स्टडी के अनुसार, 30 दिन बाद मरीज का वजन कम हुआ, पेट से जुड़े लक्षण कम हुए और अल्ट्रासाउंड में फैटी लिवर की ग्रेडिंग भी पहले से बेहतर पाई गई। इस पद्धति से जीवनशैली आधारित फैटी लिवर रोग को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

पं. खुशीलाल शर्मा शासकीय आयुर्वेद कॉलेज के पंचकर्म विभाग ने एक महिला मरीज पर आयुर्वेदिक उपचार की केस स्टडी की है।

महिला को था ग्रेड 2 फैटी लिवर इस अध्ययन में 49 वर्षीय महिला मरीज शामिल थी, जिसे लगातार थकान, कब्ज, पेट में भारीपन, गैस, भूख न लगना और मतली जैसी समस्याएं थीं। छह महीने से ये लक्षण बने हुए थे। अल्ट्रासाउंड में ग्रेड-2 फैटी लिवर पाया गया था।

मरीज को एक माह तक दो आयुर्वेदिक विधियों से इलाज किया गया:

  • कफहर बस्ती – 15 दिन तक विशेष अनुपात में पंचकर्म बस्ती प्रक्रिया कराई गई। कफहर बस्ती पंचकर्म का हिस्सा है जो शरीर से कफ और मेद को हटाने में सहायक माना जाता है। बस्ती के तत्व लिवर के मेटाबॉलिज्म को सुधारते हैं और पाचन अग्नि को मजबूत करते हैं, जिससे लिवर में जमा वसा कम हो सकती है।
  • रोहितकाद्य चूर्ण – 30 दिन तक भोजन के बाद सेवन कराया गया। रोहितकाद्य चूर्ण में ऐसे तत्व शामिल हैं जो लिवर संरक्षक, दीपन-पाचन, अनुलोमन और कफ-पित्त शामक गुण रखते हैं। इसका असर पाचन को बेहतर बनाता है, वसा जमाव घटाने में मदद करता है और लिवर फंक्शन को सपोर्ट करता है।

उपचार के आए प्रमुख बदलाव:

  • पेट से जुड़े लक्षण कम हुए।
  • कब्ज और गैस की समस्या लगभग समाप्त।
  • वजन 64 किलो से घटकर 61.6 किलो।
  • लिवर फंक्शन टेस्ट में सुधार।
  • अल्ट्रासाउंड में ग्रेड-2 से ग्रेड-1 फैटी लिवर हो गया।
कॉलेज में स्थित पंचकर्म एंड वेलनेस सेंटर।

कॉलेज में स्थित पंचकर्म एंड वेलनेस सेंटर।

क्या है NAFLD…

पं. खुशीलाल आयुर्वेद संस्थान के प्राचार्य डॉ. उमेश शुक्ला ने बताया कि नॉन अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज यानी NAFLD उस स्थिति को कहा जाता है जिसमें शराब न पीने वाले व्यक्ति के लिवर में भी अतिरिक्त चर्बी जमा होने लगती है। यह आज की बदलती जीवनशैली, गलत खानपान, मोटापे और कम शारीरिक गतिविधि की वजह से बहुत तेजी से फैल रहा है। शुरुआत में यह निष्क्रिय रहता है, लेकिन लंबे समय में यह नॉन-अल्कोहॉलिक स्टीटोहेपेटाइटिस (NASH), फाइब्रोसिस, सिरोसिस और यहां तक कि लिवर कैंसर का कारण भी बन सकता है। कई बार मरीज को शुरुआती समय में इसके लक्षण महसूस नहीं होते, इसलिए रोग आगे बढ़ जाता है।

अब तक नहीं मिली रोग की कोई दवा केस स्टडी में दावा किया गया कि मॉडर्न मेडिसिन में NAFLD के लिए दवाएं तो मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभाव सीमित होता है और कई बार साइड इफेक्ट भी सामने आते हैं। यही वजह है कि मरीज जीवनशैली सुधार, डाइट कंट्रोल और ऑप्शनल चिकित्सा की ओर रुख कर रहे हैं।

आयुर्वेद में पहले से है बीमारी का इलाज आयुर्वेद में इस बीमारी को संतर्पणजन्य विकार के रूप में समझा गया है, जिसमें कफ, मेदधातु और अग्निमांद्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आयुर्वेदिक सिद्धांत के अनुसार उपचार में कफ-मेध हर, अग्नि दीपक, आम नाशक और स्रोतोशोधन प्रक्रियाएं उपयोगी मानी जाती है।

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