चोर-चोर मौसेरे भाई, आगे कुआं पीछे खाई, बांगलादेश-पाकिस्तान दोनों की शामत आई

चोर-चोर मौसेरे भाई, आगे कुआं पीछे खाई, बांगलादेश-पाकिस्तान दोनों की शामत आई


नई दिल्ली. पिछले कुछ दिनों में ऐसे कई ऐसी खबरें सामने आई हैं, जिनमें यह तर्क दिया गया है कि भारत–पाकिस्तान और भारत–बांग्लादेश के हालात एक जैसे हैं. दलील यह दी जा रही है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच मुकाबलों के लिए न्यूट्रल वेन्यू तय किए जा सकते हैं, तो बांग्लादेश के लिए ऐसा क्यों नहीं किया गया. कुछ लोगों ने इसे आईसीसी के “डबल स्टैंडर्ड्स” का उदाहरण भी बताया है. लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है. जो लोग बांग्लादेश की स्थिति की तुलना पाकिस्तान की रणनीति से कर रहे हैं, वे या तो तथ्यों से अनजान हैं या जानबूझकर वास्तविकता को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.

बांग्लादेश से जुड़ा पूरा मामला मूल रूप से बीसीसीआई और आईपीएल से जुड़े एक फैसले से शुरू हुआ था, जो खुद सीमा पार लंबे समय से चल रहे राजनीतिक उथल-पुथल का नतीजा था. अगर सुरक्षा एजेंसियों ने यह निष्कर्ष निकाला होता कि भारत में बांग्लादेशी खिलाड़ियों और सपोर्ट स्टाफ को गंभीर खतरा है, तो बिना किसी संदेह के उनके मैचों का शेड्यूल बदला जाता भले ही इससे कितनी ही असुविधा क्यों न होती. लेकिन जब सुरक्षा विशेषज्ञों ने यह स्पष्ट कर दिया कि खतरा बेहद सीमित या लगभग न के बराबर है, तब पूरे टूर्नामेंट के कार्यक्रम को भारी लागत पर बदलने और अन्य टीमों पर उसके व्यापक असर को झेलने का कोई ठोस आधार नहीं बचा.

मुस्तफिज़ुर विवाद और बांग्लादेश की गलती

रिकॉर्ड के लिए यह साफ़ करना ज़रूरी है कि मुस्तफिज़ुर रहमान के मुद्दे पर बांग्लादेश का बीसीसीआई से टकराना पूरी तरह जायज़ था. लेकिन बांग्लादेश यहीं चूक गया कि उसने एक द्विपक्षीय विवाद को पूरे क्रिकेट जगत के खिलाफ राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का मुद्दा बना दिया. यहीं से भारत की लड़ाई आईसीसी की लड़ाई बन गई और उस मोर्चे पर बांग्लादेश की जीत की कोई संभावना नहीं थी. अंततः बांग्लादेश को नुकसान इसलिए उठाना पड़ा क्योंकि उसकी राजनीतिक जमात जो क्रिकेट बोर्ड के आधिकारिक बयानों के पीछे से फैसले ले रही थी यह समझने में नाकाम रही कि वैश्विक हित हमेशा किसी एक नाराज़ पक्ष की शिकायतों से ऊपर रखे जाते हैं. आईसीसी बोर्ड में आया 14–2 का फैसला इस सच्चाई का सबसे बड़ा सबूत था.

पाकिस्तान का मामला क्यों अलग है

पाकिस्तान का मामला इससे बिल्कुल अलग है. नॉर्स पौराणिक कथाओं के पात्र ‘लोकी’ की तरह, मोहसिन नक़वी और उनकी टीम मानो सिर्फ़ अराजकता फैलाने में ही आनंद लेती दिखाई देती है. टूर्नामेंट का शेड्यूल जारी होने से कई महीने पहले ही भारत और पाकिस्तान इस बात पर सहमत हो चुके थे कि कम से कम 2027 तक उनके मुकाबले न्यूट्रल वेन्यू पर ही खेले जाएंगे. बीसीसीआई ने पाकिस्तान के मैच श्रीलंका में कराने पर सहमति दी थी, ठीक वैसे ही जैसे 2025 चैंपियंस ट्रॉफी में भारत के लिए यूएई को बेस बनाया गया था. मोहसिन नक़वी के पास अपने तर्क के समर्थन में कोई ठोस आधार नहीं है. श्रीलंका में किसी तरह का सुरक्षा खतरा नहीं है, और वह यह भी भली-भांति जानते हैं कि भारत पाकिस्तान मुकाबला किसी भी आईसीसी टूर्नामेंट का सबसे बड़ा आकर्षण होता है. इसी वजह से न्यूट्रल वेन्यू का व्यावहारिक फैसला लिया गया था. अगर पाकिस्तान भारत के खिलाफ मैच का बहिष्कार करता है जिसका कोई तार्किक कारण समझ में नहीं आता तो होस्ट ब्रॉडकास्टर आईसीसी को भारी भरकम मुआवज़े का बिल थमा देगा.

आर्थिक नुकसान और उसके असर

यह राशि अंततः सभी भागीदार देशों के राजस्व हिस्से से काटी जाएगी. भारत के लिए यह नुकसान नगण्य होगा, लेकिन कई छोटे बोर्डों के लिए यह उनके अंडर-19 या महिला क्रिकेट कार्यक्रमों को जारी रखने या बंद करने के बीच का फर्क बन सकता है अगर पाकिस्तान जानबूझकर टूर्नामेंट को पटरी से उतारने की कोशिश करता है, तो इसके गंभीर नतीजे होंगे और जवाबदेही की मांग सिर्फ़ बीसीसीआई की ओर से नहीं आएगी हर बोर्ड को नुकसान उठाना पड़ेगा. ऐसे अनिश्चित आर्थिक दौर में, बहुत कम क्रिकेट बोर्ड नक़वी के इस ‘एडवेंचरिज़्म’ को सहन करेंगे. पीएसएल और बीपीएल दोनों ही अपने-अपने बोर्डों की आर्थिक स्थिरता के लिए बेहद अहम हैं अगर आईसीसी सदस्य बोर्डों को इन लीगों के लिए एनओसी न देने का निर्देश देता है, तो नुकसान गहरा और स्थायी हो सकता है.

तुलना भी ग़लत, तर्क भी खोखला

जैसा कि स्पष्ट है, बांग्लादेश और पाकिस्तान के मामलों की तुलना करना पूरी तरह ग़लत है. बांग्लादेश के नाम पर एकजुटता दिखाते हुए पाकिस्तान का वर्ल्ड कप से हटने की धमकी देना एक स्तर पर हास्यास्पद लगता है. यह समस्या पाकिस्तान की नहीं है, फिर भी वह पीछे हटने की बात कर रहा है शायद इसलिए क्योंकि उसी ने बांग्लादेश को उकसाया और गलत रास्ते पर ले गया. अब पाकिस्तान खुद न दाएँ जा पा रहा हैन बाएँ.
खेले तो बांग्लादेश नाराज़ होगा,न खेले तो आईसीसी के कड़े प्रतिबंधों का जोखिम. इतने शोर-शराबे के बावजूद पाकिस्तान जानता है कि यह स्थिति आसान नहीं है. भालू को छेड़ना मनोरंजक लग सकता है जब तक आप खुद उसका शिकार न बन जाएं.



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