UGC Guidelines Controversy: 13 जनवरी 2026 से University Grants Commission यानी यूजीसी ने उच्च शिक्षा संस्थानों में Equity Regulations 2026 लागू कर दिया. मकसद बताया गया कैंपस में समानता, फेयरनेस और भेदभाव पर लगाम. लेकिन नियम लागू होते ही देशभर में विरोध तेज हो गया. कई छात्र संगठनों और लोगों का कहना है कि यह नियम “समानता” नहीं बल्कि “विभाजन” को बढ़ावा देगा. सवर्ण समाज के बीच खासा गुस्सा है और इसे “काला कानून” बताकर वापस लेने की मांग हो रही है.
सागर यूनिवर्सिटी में खुलकर बोली छात्र आवाज
सागर की डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय में छात्रों ने इस रेगुलेशन पर खुलकर अपनी राय रखी. किसी ने इसे छात्रों को बांटने वाला बताया, तो किसी ने समर्थन करते हुए नियमों को और साफ-सुथरा बनाने की मांग की. सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि अगर कोई झूठी शिकायत करता है तो उस पर कार्रवाई का क्या प्रावधान होगा? छात्रों का कहना है कि अभी नियम अधूरे हैं और इनमें संशोधन जरूरी है.
सरकार छात्रों को बांटना चाहती है
लॉ फाइनल ईयर के छात्र अंशुल शर्मा का कहना है कि सरकार चाहती है कि जो छात्र आज स्कॉलरशिप, फैलोशिप, एडमिशन और रोजगार जैसे मुद्दों पर एकजुट हैं, वे आपस में बंट जाएं. उनके मुताबिक जैसे ही छात्र दो वर्गों में बंटेंगे, कैंपस में वर्ग संघर्ष शुरू होगा और असली मुद्दे पीछे छूट जाएंगे. अंशुल कहते हैं कि अगर भेदभाव है तो नियम बनाइए, लेकिन कार्रवाई पारदर्शी होनी चाहिए और कमेटियों में जवाबदेही साफ दिखनी चाहिए.
गांव और शहर की हकीकत अलग है
बीकॉम सेकंड ईयर के शिवांश सिंह राजपूत मानते हैं कि गांवों में जातिगत भेदभाव ज्यादा दिखता है, वहां ये नियम कुछ हद तक ठीक लग सकते हैं. लेकिन शहरों में हालात अलग हैं. उनका कहना है कि कई जनरल कैटेगरी के छात्र खुद आर्थिक रूप से कमजोर हैं, जबकि OBC, SC-ST वर्ग के कई छात्र बेहतर स्थिति में हैं. ऐसे में सबको एक ही तराजू में तौलना गलत है.
आंदोलन की एकता टूटेगी
बीए फोर्थ सेमेस्टर की छात्रा महिमा प्यासी इस कानून के खिलाफ हैं. उनका कहना है कि अभी तक सभी छात्र संगठन मिलकर स्कॉलरशिप बढ़ाने और हॉस्टल सीट्स के लिए लड़ रहे थे, लेकिन इस एक फैसले ने माहौल बदल दिया. अब छात्रों के बीच फूट पड़ने का खतरा है और जातिगत भेदभाव खत्म होने की बजाय और बढ़ सकता है.
डर का माहौल और झूठी शिकायतों का खतरा
नरेंद्र त्रिपाठी (4th Sem) कहते हैं कि स्कूल और यूनिवर्सिटी मंदिर जैसे होते हैं, जहां सब साथ पढ़ते हैं. लेकिन इस कानून के बाद जनरल कैटेगरी के छात्रों में डर का माहौल बन सकता है. उनका सुझाव है कि झूठी शिकायत करने वालों पर जुर्माना और सख्त कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए, साथ ही कमेटियों में सभी वर्गों के शिक्षकों को शामिल किया जाए.
समर्थन भी मिला, लेकिन शर्तों के साथ
अमित धुरिया ने इक्विटी गाइडलाइंस का स्वागत किया. उनका कहना है कि इससे पारदर्शिता आएगी और जिन छात्रों का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाया है, उनकी आवाज मजबूत होगी. लेकिन वे भी मानते हैं कि नियमों को और स्पष्ट करना जरूरी है, खासकर झूठी शिकायतों से निपटने के लिए.
सिर्फ राजनीति हो रही है
सत्येश पटेल का आरोप है कि 2012 से लेकर 2026 तक यही खेल चलता आ रहा है. सरकारें चुनाव के वक्त ऐसे मुद्दे उठाकर पिछड़े वर्गों को साधने की कोशिश करती हैं. उनके मुताबिक यह फैसला छात्रों के हित से ज्यादा राजनीति से जुड़ा है.