Balaghat News : बालाघाट के खैरलांजी गांव का रहने वाला प्रसन्नजीत करीब सात साल बाद पाकिस्तान से अपने वतन लौट रहा है. लेकिन उसे वापस लाने का संघर्ष काफी बड़ा था. दरअसल, साल 2017-18 में लापता हुए प्रसन्नजीत को खोजने की जिम्मेदारी उनकी बहन संघमित्रा और जीजा राजेश खोबरागड़े पर थी. ऐसे में उन्होंने प्रसन्नजीत को लंबे समय तक ढूंढा लेकिन वह नहीं मिला. इससे पहले भी मानसिक रूप बीमार प्रसन्नजीत घर से गायब हुआ था. लेकिन बिहार से वह लौट आया. लेकिन इस बार वह लौटा नहीं.
ऐसे में काफी खोजबीन करने के बाद उनकी बहन और जीजा ने हार मान ली और उसे ढूंढना बंद कर दिया. यहां तक वह ये मान चुके थे कि प्रसन्नजीत इस दुनिया में नहीं है. लेकिन एक 31 दिसंबर 2021 को संघमित्रा को एक फोन जम्मू कश्मीर के कठुआ से आता है और उनके पैरों तले जमीन खिसक जाती है. दरअसल, वह फोन 29 साल बाद पाकिस्तान के लाहौर की कोट लखपत सेंट्रल जेल से रिहा हुए कुलजीत सिंह कछवाहा की था. उन्होंने बताया कि प्रसन्नजीत साल 2019 से पाकिस्तान की जेल में बंद है. ऐसे में उस बहन पर अपने भाई को बूढ़े मां-बाप से मिलाने की जिम्मेदारी आती है. बिड़ी बनाकर और मजदूरी कर परिवार चलाने वाली बहन संघमित्रा पर भाई को छुड़ाने की जिम्मेदारी आती है.
14 महीने भटकी फिर मिली सटीक राह
31 दिसंबर 2021 को जब बहन संघमित्रा को पता चला कि उनका भाई पाकिस्तान की जेल में बंद है. उस दिन से वह सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाना शुरु कर चुकी थी. ऐसे में कभी वह अधिकारियों से गुहार लगाती थी. तो कभी नेताओं के दरवाजे पर जाती थी. इन 14 महीने में वह बालाघाट के तत्कालीन सांसद और क्षेत्रीय विधायक के पास गई. उन्हें मदद का आश्वासन तो मिला लेकिन कोई काम न आया. उन्होंने कलेक्टर कार्यालय से लेकर गृह मंत्रालय तक आवेदन किए लिए उन्हें निराशा ही हुई. करीब 14 महीने बाद मोहल्ले के रहने वाले एक ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट और पेशे से अधिवक्ता कपिल फूले से हुई.
बहन संघमित्रा को मिला फरिश्ता
ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट और पेशे से अधिवक्ता कपिल फूले की मां ने उन्हें इस मामले के बारे में बताया. उन्होंने इससे पहले भी कई बार मानव अधिकार से जुड़े मामले में याचिका लगाई थी. लेकिन इस बार में मामला अलग और कठिन था. ऐसे में उन्होंने अपने साथियों से सलाह ली और याचिका लगाई.
कपिल फूले ने लोकल 18 को जानकारी देते हुए बताया कि जब प्रसन्नजीत की बहन संघमित्रा और उनके पति राजेश खोब्रागड़े ने उनसे मुलाकात की और याचिका दायर करने से पहले ही तथ्यों की तलाश की. इस दौरान उन्होंने पाकिस्तान की जेल से छूट कुलजीत सिंह कछवाह से बात की और जानकारी ली.
कुलजीत सिंह से पुछा पाकिस्तानी सेना को प्रसन्नजीत कैसे मिला…उन्होंने बताया वह बेहोशी की हालत में मिला था.
किस केस में दर्ज है तब कुलजीत ने बताया कि अवैध तरह से बॉर्डर पार करने के लिए.
मानसिक स्थिति कैसी है तब कुलजीत ने बताया खराब थी. शुरुआत में कुछ याद नहीं था और इलाज भी नहीं मिला.
प्रसन्नजीत को कोई वकील मिला तब कुलजीत ने बताया कोई वकील नहीं मिला.
11 फैक्ट, 3 ग्राउंड और प्रसन्नजीत को छूड़ाने की अपील
मानवाधिकार कार्यकर्ता और लॉयर कपिल फूले ने इस मामले में बहन संघमित्रा की मदद से मानव अधिकार आयोग में 21 फरवरी को एक याचिका लगाई. इसके मुताबिक, जुटाए हुए तथ्यों को 11 प्वाइंट में फैक्ट बताए. वहीं, प्रसन्नजीत के भारत वापसी के लिए महज 3 ग्राउंड बताए. इसके मुताबिक, चार साल से प्रसन्नजीत चार से पाकिस्तान की जेल में बिना ट्रायल और कानूनी मदद के बंद है.
मानसिक रूप से बीमार होने के आधार पर भेदभाव की आशंका जताई और इसे मानव अधिकार का उल्लंघन बताया. इसके अलावा उनकी बहन ने प्रशासन से गुहार लगाई और उन्होंने कोई एक्शन नहीं लिया. इन तीन आधार पर प्रसन्नजीत की रिहाई और स्वदेश वापसी के अधिकार को प्रोटेक्ट करने की मांग की.
महज 10 दिन में हुई सुनवाई
मानव अधिकार आयोग ने महज 10 दिन के भीतर प्रसन्नजीत की वतन वापसी की याचिका को स्वीकार किया और केस रजिस्टर्ड हुआ. इसके बाद 4 अप्रैल को मानव अधिकार आयोग ने बालाघाट कलेक्टर और एसपी बालाघाट को प्रसन्नजीत की रिहाई के लिए जरूरी कार्रवाई के निर्देश दिए. इसके बाद कार्रवाई तेज हुई और आखिरकार पाकिस्तान से प्रसन्नजीत की फोटो और उसकी बुनियादी जानकारी आई थी. इसमें प्रसन्नजीत से ये भी पुछा गया था कि अगर आपको भारत भेज दिया था तो उनसे पुछा गया कहां रहोगे तब प्रसन्नजीत ने बोला मैं अपने घर पर रहूंगा. तब से ही प्रसन्नजीत की स्वदेश वापसी तय हो गई.
महज 56 दिनों में वतन वापसी की कार्रवाई
मानवाधिकार आयोग में जाने के बाद महज 56 दिनों के भीतर प्रसन्नजीत की स्वदेश वापसी की राह आसान हुई. और गृह मंत्रालय ने फॉरेन डिविजन ने मध्य प्रदेश सरकार को प्रसन्नजीत के नागरिकता स्टेटस की जांच करने के लिए कहां. इसके लिए मध्य प्रदेश सरकार ने डीजीपी, डीजीपी ने एसपी बालाघाट और बालाघाट एसपी ने वारासिवनी एसडीओपी से नागरिकता स्टेट्स की प्रक्रिया की.
इसी के साथ पाकिस्तान से आए प्रपत्र को बहन संघमित्रा को भी दिखाए गए और वेरिफिकेशन करवाया. यह प्रक्रिया 30 अप्रैल को हुई. इस दिन संघमित्रा का एक वीडियो भी रिकॉर्ड किया गया. इसे पाकिस्तान भेजा गया. इसी दिन उनके पिता बेटे की राह में आखिरी सांसे गिनते रहे. जब प्रसन्नजीत की वतन वापसी की उम्मीदें तेज हुई तब तक उनके पिता लोपचंद रंगारी दुनिया छोड़ चुके थे.
कार्रवाई के 21 महीने में ही रिहा हुआ प्रसन्नजीत
इसके बाद प्रसन्नजीत की वतन वापसी की उम्मीदें तो बढ़ गई लेकिन जब तक भाई आखों के सामने न आता तो चैन कहा पड़ता. इसके बाद भी संघमित्रा ने दफ्तरों में गई. वहीं, उन्होंने बताया गया कि भारत सरकार की ओर से सारी प्रक्रिया पूरी हो गई. ऐसे में उनका इंतजार महज 21 महीने में ही खत्म हो गया. वहीं, प्रसन्नजीत पर कोई गंभीर आरोप न होने के कारण उसे पाकिस्तान ने भी जल्द रिहा कर दिया
अब घर आ रहा प्रसन्नजीत
पाकिस्तान से सात भारतीय नागरिकों को रिहा किया गया. उन्हें अटारी-वाघा बॉर्डर पर बीएसएफ के हवाले किया गया. फिर भारत ने कस्टम और इमिग्रेशन की प्रोसेस पूरी करने के बाद सभी की नानकदेव अस्पताल में मेडिकल जांच करवाई. उसके बाद 1 फरवरी को परिजनों को लेने बुलाया गया लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर थी. ऐसे में वह दो दिनों तक इधर भटकते रहे लेकिन गांवों के हर एक कार्यक्रम में पधारने वाले किसी विधायक और सांसद ने इतनी जहमत तक नहीं उठाई की उनके परिजनों से मिले और प्रसन्नजीत को उनके घर तक सुरक्षित पहुंचाएं.
लोकल 18 ने मामले को कलेक्टर मृणाल मीना को दी और मदद की गुहार लगाई. तब कलेक्टर मृणाल मीना ने न सिर्फ आने जाने की व्यवस्था की बल्कि रोजगार सहायकों को नियुक्त भी किया. साथ ही एसपी आदित्य मिश्रा ने कानूनी अड़चनों को आसान बनाने के लिए एक जवान को भी अमृतसर भेजा. अब प्रसन्नजीत अपनी मां और बहन से मिल पाएगा.