वर्ल्ड कप के लिए ब्लू प्रिंट तैयार, टीम इंडिया की नई टैग लाईन ‘बजाते रहो’

वर्ल्ड कप के लिए ब्लू प्रिंट तैयार, टीम इंडिया की नई टैग लाईन ‘बजाते रहो’


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भारत इस T20 वर्ल्ड कप को किस नज़रिए से देख रहा है. हमला, और सिर्फ़ हमला. पावरप्ले में एक-दो विकेट गिर भी जाएँ तो क्या? जो भी बल्लेबाज़ आता है, वही टेम्पलेट अपनाता है और ज़्यादातर बार, अच्छे बल्लेबाज़ी हालात में, यह रणनीति कामयाब होती है.

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भारत का ऑल-आउट अटैक: T20 का नया ब्लूप्रिंट, वर्ल्ड कप में भी चलेगा यहीं फॉर्मूला

नई दिल्ली. भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच हुए वॉर्म-अप मैच को जिसने भी देखा, वह समझ गया होगा कि बात किस दिशा में जा रही है. पहली गेंद से ही भारत का रवैया आक्रामक था बिना किसी झिझक के, लगातार हमला यही अब इस भारतीय T20 टीम की पहचान बन चुकी है. कगिसो रबाडा और एनरिख नॉर्टजे जैसे विश्व-स्तरीय गेंदबाज़ भी भारतीय बल्लेबाज़ों के सामने बेबस नज़र आए. वर्ल्ड कप केलने आई टीमें ये डिकोड करने में लगी है कि इस टीम का राज क्या है. टीम के पिछले एक सा के सफर को देखेंगे तो पाएंगे कि असली राज़ है एप्रोच, और इसके लिए टीम मैनेजमेंट को पूरा श्रेय दिया जाना चाहिए.

ऐसे नही है कि अभिषेक शर्मा नाकाम नहीं हुए न्यूज़ीलैंड के खिलाफ पाँच मैचों में वह दो बार असफल रहे लेकिन इससे उनके खेलने के तरीके में कोई बदलाव नहीं किया गया. उन्हें खुलकर खेलने की पूरी छूट दी गई है, चाहे नतीजा कुछ भी हो कुछ असफलताएँ मायने नहीं रखतीं, और अभिषेक जानते हैं कि मैनेजमेंट का पूरा समर्थन उनके साथ है. यही बात ईशान किशन के मामले में और भी ज़्यादा लागू होती है. किसी भी खिलाड़ी की वापसी आमतौर पर दबाव के साथ होती है जगह दांव पर होती है, और ऊपर से वर्ल्ड कप सामने हो तो आशंका स्वाभाविक है. ऐसे में अगर ईशान संभलकर खेलते, पहले अपनी जगह पक्की करने की कोशिश करते, तो यह बिल्कुल समझने योग्य होता लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया.

टीम इंडिया का ‘ब्लू प्रिंट’

दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ वॉर्म-अप मैच जो वर्ल्ड कप से पहले आख़िरी मुकाबला था उसमें ईशान को संजू सैमसन से पहले ओपनिंग के लिए भेजा गया. सिर्फ़ 20 गेंदों में उन्होंने मैच का रुख तय कर दिया, फिर रिटायर्ड हो गए. छक्कों की बरसात, मानो किसी हाइलाइट्स वीडियो से निकली हो ईशान की यह पारी इस बात का साफ़ संकेत थी कि भारत इस T20 वर्ल्ड कप को किस नज़रिए से देख रहा है. हमला, और सिर्फ़ हमला. पावरप्ले में एक-दो विकेट गिर भी जाएँ तो क्या? जो भी बल्लेबाज़ आता है, वही टेम्पलेट अपनाता है और ज़्यादातर बार, अच्छे बल्लेबाज़ी हालात में, यह रणनीति कामयाब होती है. जबरन ब्रेक के बाद अपना दूसरा मैच खेल रहे तिलक वर्मा ने भी यही तरीका अपनाया. मंत्र टीम में फैल चुका है. खिलाड़ियों को पता है कि उन्हें क्या करना है और वे ड्रेसिंग रूम में बनी योजना को मैदान पर उतार रहे हैं असाधारण क्षमता वाले खिलाड़ियों के साथ यह टेम्पलेट फिलहाल पूरी तरह सफल दिख रहा है.

क्या एक एंकर बल्लेबाज चाहिए ?

सवाल यही है कि क्या भारत इसे अंत तक निभा पाएगा, या फिर किसी प्लान बी की भी ज़रूरत है? आखिर पिछला वर्ल्ड कप फाइनल विराट कोहली की शानदार एंकर पारी की बदौलत ही जीता गया था. लेकिन सच्चाई यह है कि पिछले दो सालों में इस फॉर्मेट का टेम्पलेट बदल चुका है. अब एंकर योजना का हिस्सा नहीं हैं. दो विकेट गिरने के बाद खेल को धीमा करने के लिए आपको कोहली या शुभमन गिल जैसे बल्लेबाज़ की ज़रूरत नहीं समझी जा रही. यह पूरी तरह हाई-रिस्क, हाई-रिवार्ड का खेल है, और अब तक तो भारत के लिए यह कारगर रहा है पर सवाल ये है कि क्या वे इसे अंत तक ले जा पाएँगे यही तय करेगा कि 8 मार्च को सूर्यकुमार यादव ट्रॉफी उठा पाएँगे या नहीं. यह भी कहा जा सकता है कि इस आक्रामकता में एक पद्धति छुपी है शुरुआत से ही गेंदबाज़ों पर लक्षित हमला, उन्हें असहज करना, उनके दिमाग में डर बैठाना. यह वाकई एक सोची-समझी रणनीति है, और फैंस इसका भरपूर मज़ा ले रहे हैं.

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