पटना: जब भी मैदान पर वैभव सूर्यवंशी बल्ला थामकर उतरते हैं तो स्टेडियम में दर्शकों की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं. घरों में लोग टीवी और मोबाइल से चिपक जाते हैं. सबको यही लगता है कि अब चौकों और छक्कों की बरसात होगी. लेकिन, एक शख्स ऐसा है जो उस वक्त टीवी तक नहीं देख पाता. जबतक वैभव शतक नहीं लगा लेते या अपनी पारी समाप्त नहीं कर देते तबतक यह इंसान बेचैन होकर इधर उधर घूमते रहते हैं और किसी को स्कोर बताने से साफ मना करते हैं. यह पहले इंसान होंगे जो वैभव सूर्यवंशी की बैटिंग खत्म होने के बाद उसकी बैटिंग देखना शुरू करते हैं. ये हैं वैभव के बचपन के कोच मनीष ओझा. इनके लिए हर मैच गर्व से ज़्यादा बेचैनी लेकर आता है.
लोकल 18 ने मनीष ओझा से इसका कारण पूछा उन्होंने बताया कि जब उसकी बैटिंग आती है तो उसके परफॉर्मेंस को लेकर मैं नर्वस रहता हूं. जबतक उसकी बैटिंग खत्म नहीं हो जाती तबतक भगवान से प्रार्थना करता रहता हूं. यह मेरे लिए एक टोटका है.
वर्ल्ड कप फाइनल में स्टेडियम का काटते रहें चक्कर
यही नजारा देखने को मिला भारत के अंडर 19 वर्ल्ड कप के फाइनल मुकाबले में. दरअसल, इस दौरान वैभव सूर्यवंशी के कोच मनीष ओझा पटना स्थित मोइनुल हक स्टेडियम में अंडर 23 का फाइनल मैच देख रहे थे. दूसरी तरफ, वैभव सूर्यवंशी की बैटिंग चल रही थी. ग्राउंड स्टाफ से लेकर बीसीए के अधिकारी तक हर कोई मोबाइल पर वैभव की बैटिंग देख रहा था. लेकिन, उनके कोच बेचैनी के साथ मैदान में इधर उधर टहल रहे थे. जैसे जैसे वैभव शतक के करीब पहुंचता, उनकी बेचैनी बढ़ती जाती. इस दौरान उन्होंने आस पास के लोगों को साफ मना कर दिया था कि कोई भी उन्हें स्कोर नहीं बताएगा. जैसे ही वैभव ने शतक जमाया, लोग खुशी से चिल्लाने लगे तो मनीष ओझा दौड़ते हुए आएं और फिर रिप्ले में वो शॉट देखा. शतक लगते ही उनके चेहरे पर सुकून देखने को मिला.
कोच ने बताया क्यों करते हैं ऐसा
उन्होंने लोकल 18 को बताया, “मैंने उसे एक बच्चे की तरह ट्रेन किया है. उससे बेटे जैसा एक अलग ही लगाव है. मुझे डर लगा रहता है कि कहीं वह आउट न हो जाए, इसीलिए मैं यह टोटका अपनाता हूं.” उन्होंने आगे कहा कि अब तक उन्होंने वैभव के सिर्फ दो ही मैच देखे हैं. पटना के मोईनुल हक स्टेडियम में भी जब उसका मैच होता है, तो वह ग्राउंड में मौजूद रहने के बावजूद वैभव की बैटिंग के दौरान किसी कोने में बैठ जाते हैं. लोगों के शोर-शराबे से ही वह अंदाजा लगाते रहते हैं कि मैदान में क्या हो रहा है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उनकी नर्वसनेस उन पर हावी हो जाती है.
डेब्यू मैच के दौरान सो गए थे
उन्होंने आगे बताया कि मुंबई के खिलाफ जब वैभव रणजी में डेब्यू कर रहा था उस समय स्टेडियम में खूब भीड़ थी. मेरे और वैभव के पिता के लिए वो क्षण काफी खास था. एक तरफ वैभव सूर्यवंशी बैटिंग कर रहा था और दूसरी तरफ सरमन निग्रोध, दोनों मेरे ही स्टूडेंट थे. उस समय मेरे लिए बहुत पैनिक सिचुएशन था. खुद को संभालना बहुत मुश्किल हो रहा था. इसीलिए ग्राउंड स्टाफ के रूम में जाकर सो गया. मैंने मैच नहीं देखा था.
सूर्यवंशी का वैभव दुनिया देख रही, मैंने संघर्ष देखा है
कोच मनीष ओझा आगे बताते हैं कि आज सूर्यवंशी के वैभव को दुनिया देख रही है लेकिन मैंने उनके संघर्ष को देखा है. शुरुआती दिनों में, उनके पिता एक दिन के गैप पर उसको समस्तीपुर से पटना मेरे एकेडमी में लेकर आते थे. आर्थिक तंगी के बावजूद ट्रेनिंग का खर्च, सफर का खर्च, इतनी दूर आने जाने के दौरान थकान, सुबह से शाम तक मैदान में खड़ा रहना, खाने पीने का खर्च सहित हर चीज को मैंने बेहद करीब से महसूस किया है. इन्हीं संघर्षों के बदौलत आज वैभव सफल हो रहे हैं.
मैच में करता है गलती तो तुरन्त कॉल कर देता हूं
उन्होंने आगे बताया कि उनके हर गेम को मैं बेहद बारीकी से देखता हूं. मैच के दौरान उनकी गलतियों को पॉइंट आउट करके कॉल कर बताता हूं. इस टूर्नामेंट में तो नहीं लेकिन विजय हजारे के दौरान कई बार लंबी बातचीत हुई थी. हालांकि, व्हाट्सप्प पर हमेशा बातचीत होती है. अभी हाल ही में, इसी टूर्नामेंट में मैंने देखा कि सभी टीम उनको शॉर्ट ऑफ लेंथ बॉल पर टारगेट कर रही थी तो इसी सिलसिले में बातचीत हुई थी.