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Sugar Free Gehun Kheti: शिवपुरी के किसान जैविक खेती की ओर बढ़े रहे हैं. यही वजह है कि गेहूं की खेती में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. यहां तक की इस खेती के कारण मिट्टी और उपजाऊ हो गई है. किसान प्रेम शर्मा ने खुद बताया फायदा. जानें सब…
Shivpuri News: मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में ‘शुगर फ्री’ गेहूं की खेती हो रही है. यहां किसान अब जैविक खेती की ओर बढ़ रहे हैं. इसी वजह से इस बार खास गेहूं की खेती शुरू की है. प्रगतिशील किसान प्रेम शर्मा ने जैविक तरीके से ‘शुगर फ्री’ गेहूं की खेती कर एक पहल की है. उनका कहना है कि आज के समय में बढ़ती बीमारियों, खासकर मधुमेह (शुगर) की समस्या को देखते हुए लोगों को स्वस्थ विकल्प उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है.
प्रेम शर्मा अपने खेत में दो विशेष किस्मों का गेहूं उगा रहे हैं. पहला खपली (एमर व्हीट) और दूसरी बंसी किस्म का गेहूं. खपली गेहूं को पारंपरिक और पौष्टिक किस्म माना जाता है, जिसमें सामान्य गेहूं की तुलना में ग्लूटेन कम और फाइबर अधिक पाया जाता है. यही कारण है कि इसे मधुमेह रोगियों के लिए लाभकारी बताया जाता है. बंसी गेहूं भी अपनी पौष्टिकता और स्वाद के लिए जाना जाता है.
खेत में सिर्फ ये खाद डालीं
किसान प्रेम शर्मा बताते हैं कि उन्होंने इस फसल को पूरी तरह जैविक पद्धति से तैयार किया है. खेत में किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद या कीटनाशक का उपयोग नहीं किया गया. उन्होंने गोबर खाद, जीवामृत, घनजीवामृत और अन्य जैविक तत्वों का इस्तेमाल किया. उनका मानना है कि रासायनिक खेती से जमीन की उर्वरक क्षमता धीरे-धीरे कम हो जाती है, जबकि जैविक पद्धति मिट्टी की सेहत को बेहतर बनाती है और लंबे समय तक उत्पादन बनाए रखती है.
बाजार में हमेशा मांग
किसान ने बताया, आज के दौर में लोगों की जीवनशैली और खान-पान में आए बदलाव के कारण बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. ऐसे में अगर किसान शुद्ध और पौष्टिक अनाज का उत्पादन करें, तो यह समाज के लिए बड़ी सेवा होगी. शुगर के मरीजों के लिए खपली गेहूं का आटा बेहतर विकल्प साबित हो सकता है, क्योंकि यह धीरे-धीरे पचता है और रक्त में शर्करा का स्तर अचानक नहीं बढ़ाता. कहा, किसान अगर चाहें तो पारंपरिक और देसी बीजों के माध्यम से भी अच्छी आमदनी कर सकते हैं. जैविक उत्पादों की बाजार में मांग लगातार बढ़ रही है. उपभोक्ता स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो रहे हैं.
फायदा बढ़ा, लागत कम हुई
प्रेम शर्मा ने बताया, शुरुआत में जैविक खेती करना थोड़ा चुनौतीपूर्ण लगा, लेकिन धीरे-धीरे अनुभव बढ़ने के साथ उत्पादन बेहतर होने लगा. खेत की मिट्टी पहले की तुलना में अधिक भुरभुरी और उपजाऊ हो गई है. लागत में भी कमी आई है, क्योंकि रासायनिक खाद और दवाइयों पर खर्च नहीं करना पड़ता. उनका मानना है कि यदि अन्य किसान भी जैविक पद्धति अपनाएं तो न केवल उनकी आय में वृद्धि होगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी. जैविक खेती से मिट्टी, पानी और हवा प्रदूषण से बचते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ वातावरण तैयार होता है.
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एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय. प्रिंट मीडिया से शुरुआत. साल 2023 से न्यूज 18 हिंदी के साथ डिजिटल सफर की शुरुआत. न्यूज 18 के पहले दैनिक जागरण, अमर उजाला में रिपोर्टिंग और डेस्क पर कार्य का अनुभव. म…और पढ़ें