बाघों के घर में आस्था का संगम: रातापानी के ‘कैरी के महादेव’ में पहुंचीं महिलाएं, साल में दो दिन खुलता है जंगल का रास्ता – Bhopal News

बाघों के घर में आस्था का संगम:  रातापानी के ‘कैरी के महादेव’ में पहुंचीं महिलाएं, साल में दो दिन खुलता है जंगल का रास्ता – Bhopal News




भोपाल से 24 किमी दूर रातापानी टाइगर रिजर्व की घाटी में बसे ‘कैरी के महादेव’ मंदिर में महाशिवरात्रि पर आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। मोटरसाइकिल, ट्रैक्टर और कारों से श्रद्धालु पहुंचे, बड़ी संख्या महिलाओं की भी रहती है। मान्यता है कि यहां बहती जलधारा की छींटें पड़ने से संतान सुख, रोग और समस्याओं से मुक्ति मिलती है। खास बात यह कि मंदिर तीन बाघों के क्षेत्र की सीमा पर स्थित है और आसपास भालू-तेंदुए भी देखे जाते हैं। साल में सिर्फ दो दिन जंगल का रास्ता आम लोगों के लिए खुलता है, बाकी समय सख्त पाबंदी रहती है। संतान की कामना से पहुंचती हैं महिलाएं
मंदिर के महंत हरिगिरि महाराज के अनुसार, यहां ऐसी आस्था है कि जिन महिलाओं को संतान नहीं हो रही, वे मनोकामना लेकर आती हैं। मंदिर के पास विशाल कैरी (आम) के वृक्ष की जड़ों से निकलती 12 माह बहने वाली जलधारा को ‘महादेव की जटाएं’ माना जाता है। मान्यता है कि इस जल की छींटें पड़ने से मनोकामना पूरी होती है। यही कारण है कि महाशिवरात्रि और भूतड़ी अमावस्या पर बड़ी संख्या में महिलाएं दर्शन के लिए पहुंचती हैं। तीन बाघों की सीमा पर बसा मंदिर
स्थानीय निवासी रामू भल्लावी बताते हैं कि जहां मेले में भीड़ उमड़ी, वहां एक सप्ताह पहले ही बाघ ने गाय का शिकार किया था। वन रक्षकों के मुताबिक मंदिर तीन बाघों के टेरिटरी एरिया की सीमा पर स्थित है और उन्हें आसपास घूमते देखा गया है। क्षेत्र में भालू, तेंदुआ, चीतल, नीलगाय, लकड़बग्गा और अन्य वन्यजीव भी मौजूद हैं। आम दिनों में प्रवेश प्रतिबंधित है
रातापानी अभयारण्य में स्थित होने के कारण मंदिर तक आम दिनों में प्रवेश प्रतिबंधित है। वन विभाग साल में सिर्फ दो अवसर महाशिवरात्रि और भूतड़ी अमावस्या पर आम लोगों को आने की अनुमति देता है। अन्य दिनों में यहां वन सफारी के जरिए ही पहुंचा जा सकता है, जिसके लिए 6 लोगों का करीब 4300 रुपए शुल्क लगता है। बिना अनुमति प्रवेश पर जुर्माना और जेल तक की सजा हो सकती है। 26 साल से गुफा में रह रहे महंत
मंदिर में पिछले 28 सालों से हरिगिरि महाराज पूजा-अर्चना कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 2009 में धर्मगिरि महाराज के देवलोक गमन के बाद उन्होंने सेवा संभाली। वे मंदिर परिसर की खुली गुफा में अकेले रहते हैं। आसपास के ग्रामीण भोजन की व्यवस्था कर देते हैं। यहां पानी की कभी कमी नहीं होती। 100 साल पुराना मेला, बुनियादी सुविधाओं की मांग
शिव शक्ति केरी महादेव सेवा समिति के आयोजक चंदरसिंह भल्लावी के अनुसार, यहां 100 वर्षों से साल में दो बार मेला आयोजित होता आ रहा है। पहले पूर्वज आयोजन करते थे, अब समिति यह जिम्मेदारी निभा रही है। समिति ने मंदिर तक सीढ़ी, पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की है, ताकि श्रद्धालुओं को कठिनाई न हो। जंगल और आस्था का बना संगम स्थल
घाटी में स्थित यह मंदिर पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा है। 200 साल पुराना कैरी का विशाल वृक्ष इसकी पहचान बन चुका है। वन विभाग के अनुसार यह क्षेत्र फ्लोरा और फौना के लिए अनुकूल है। ग्रामीणों की जागरूकता से आग की घटनाएं कम हुई हैं और शिकार जैसी गतिविधियों की सूचना समय पर मिल जाती है। रातापानी के जंगल में बाघों की मौजूदगी के बीच आस्था का यह संगम हर साल हजारों लोगों को आकर्षित करता है। खासकर महिलाओं के लिए यह स्थान विश्वास और उम्मीद का केंद्र बन चुका है।



Source link