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Satgarh Underwater city: मध्य प्रदेश के सागर में 1100 साल पुरानी कलचुरी कालीन सतगढ़ नगरी कढ़ान बांध परियोजना में डूब गई, जिससे इतिहास के कई रहस्य भी पानी में समा गए. इतिहासकारों का मानना है कि मंदिरों के पास स्थित प्राचीन कुओं में मूर्तियां, सिक्के और संभावित खजाना छिपा हो सकता था, लेकिन उत्खनन से पहले ही यह क्षेत्र जलमग्न हो गया. आइए जानते हैं इसके बारे में रहस्यमयी बातें…
सागर. भगवान श्री कृष्ण की नगरी द्वारिका समुद्र में डूबी हुई है और यह कई तरह के रहस्य भी अपने अंदर छुपाए हुए है. अब ठीक इसी तरह बुंदेलखंड के सागर में भी ऐतिहासिक कलचुरी कालीन सतगढ़ नगरी भी पानी में डूब गई है. जिसके साथ ही इस नगर का वैभव भी रहस्य बनकर रह गया है, क्योंकि इतिहासकारों के द्वारा 1100 साल पुराने मंदिरों के पास स्थित कुओं से उत्खनन कराए जाने की मांग की जा रही थी. उन्हें इन कुओं से भव्य ऐतिहासिक मूर्तियां, सिक्के खजाना जैसी चीजें मिलने का अनुमान था. इससे बहुत से राज भी सामने आते.
हालांकि कढ़ान सतगढ़ बांध मध्यम सिंचाई परियोजना में इस नगर के साथ चार मंजिला किला भी पानी में समा गया है. जबकि यह किला आर्कियोलॉजी सर्वे आफ इंडिया की सूची में शामिल थास लेकिन ना तो जल संसाधन विभाग ने ना इस बांध को बनाने वाली कंपनी ने NOC ली, और ना की ही Asi की तरफ से आपत्ति ली गई. यह किला डांगी राजाओं की ओर से 16 वीं सदी के आसपास बनवाया गया होगा, जो गढ़ी या शिकारगाह के रूप में रहा होगा. अंग्रेजों ने भी लंबे समय तक इसका उपयोग किया है.
क्या बोले इतिहासकार?
इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (INTACH) के जिला अध्यक्ष और इतिहासकार डॉ रजनीश जैन बताते हैं कि आज जिस पहाड़ी पर डॉक्टर हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय स्थित है, और जब सागर का तालाब नहीं हुआ करता था तब यहां रिवर सिस्टम था. जहां का पानी एकत्रित होकर नदी के रूप में बहता हुआ सतगढ़ से होते हुए फोर लाइन मैहर के पास धसान नदी तक जाता था. इसी कढ़ान नदी के किनारे यह बड़ा समृद्ध नगर हुआ करता था. यही पर मुझे भी चार टीले मिले, टीले के पास मंदिर और मंदिर के पास कुआं था, लेकिन मुगल शासन काल में आक्रांताओं के द्वारा जब हमला किया गया तो उस समय मूर्तियों को बचाने का चलन ऐसा था कि वह कुआं में डाल दी जाती थी.
इसके साथ ही भारत में धार्मिक स्थान के पास स्थित कुआं में सिक्के पैसे डालने का रिवाज रहा हैं. यहां तक की आक्रमण के दौरान इन कुआं में खजाना भी फेंक दिया जाता था. अगर इनका उत्खनन हो जाता तो यहां का ऐतिहासिक वैभव से जुड़े बहुत से रहस्य खुल सकते थे, लेकिन अब यह राज राज बनकर ही रह गया.
क्या-क्या मिला?
डॉ. रजनीश जैन बताते हैं कि यहां के मंदिरों से कलचुरी कालीन राजा शंकरगढ़ के अभिलेख प्राप्त हुए जिन्हें ब्रिटिश अधिकारियों ने निकाला था. अब यह अभिलेख यूनिवर्सिटी के म्यूजियम में रखा है, इसके अलावा 5-6 साल तक उन्होंने भी यहां पर काम किया. इस दौरान 165 से अधिक मूर्तियां अभिलेख मंदिरों के स्तंभ और अन्य चीज जिला पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में रखवाई और उनके दस्तावेजकरण करवाया. इतिहासकार डॉ रजनीश जैन का मानना है कि अभी भी इस पहाड़ के आसपास कुछ कुएं बचे हुए हैं. इसके लिए उन्होंने प्रशासन से अनुरोध किया है कि उनके डूबने से पहले अगर उत्खनन हो जाए तो जो कुछ अवशेष रह गए हैं तो वह उससे निकाल सकते हैं, जिनमें मूर्तियां और खजाना भी हो सकता है.
अभी भी रहस्य बना हुआ है
बांध परियोजना में यह नगरी भले ही डूब गई हो लेकिन आज भी यह पर्यटन के हिसाब से बहुत ही सुंदर स्थल है, जहां प्रवासी पक्षियों का जमावड़ा लगता है. पहाड़ के बीच से बहती नदीऔर जंगल से गिरा एरिया इसके अलावा आदिमानव के द्वारा यहां बनाए गए शैल चित्र बड़ी संख्या में पाए जाते हैं जो बताता है कि यहां पर 10 – 12 हजार साल पहले तक भी मानव जीवन रहा है. यहां का ज्ञात इतिहास 950 ई से मिलता है, लेकिन इसके पहले यह और कितना पुराना रहा होगा यह अब रहस्य बन गया है.
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Dallu Slathia is a seasoned digital journalist with over 7 years of experience, currently leading editorial efforts across Madhya Pradesh and Chhattisgarh. She specializes in crafting compelling stories across …और पढ़ें