चंद्रशेखर आज़ाद का वो सीक्रेट ठिकाना, जहां तैयार होते थे क्रांतिकारी, मूंछों पर ताव वाली मशहूर तस्वीर यहीं बनी!

चंद्रशेखर आज़ाद का वो सीक्रेट ठिकाना, जहां तैयार होते थे क्रांतिकारी, मूंछों पर ताव वाली मशहूर तस्वीर यहीं बनी!


आशीष पांडेय/शिवपुरी. चंद्रशेखर आज़ाद का नाम सुनते ही देशभक्ति अपने आप दिल में जाग उठती है. आज़ाद सिर्फ एक नाम नहीं थे, वह सोच थे, जज़्बा थे और अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ जलता हुआ विद्रोह थे. बहुत कम लोग जानते हैं कि मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले में एक ऐसी जगह है, जहां आज़ाद ने अंग्रेजों की आंखों से दूर रहकर न सिर्फ खुद को छुपाया, बल्कि कई नौजवानों को आज़ादी की लड़ाई के लिए तैयार भी किया.

शिवपुरी से करीब 110 किलोमीटर दूर खनियाधाना आज तहसील है, लेकिन आज़ादी से पहले यह इलाका क्रांतिकारियों के लिए सबसे सुरक्षित ठिकानों में गिना जाता था. यहां का सीतापाठा क्षेत्र, जहां घना जंगल और ऊंची पहाड़ियां थीं, अंग्रेज़ों की पहुंच से पूरी तरह दूर था. इसी जंगल में बारूद की गंध और धमाकों की आवाज़ें कभी आम बात हुआ करती थीं.

2 साल तक यहां रहे आजाद
शैलेंद्र सिंह जूदेव महाराज के प्रपौत्र ने लोकल 18 को बताया कि चंद्रशेखर आज़ाद करीब दो साल तक इस इलाके में रहे. उनका असली ठिकाना खनियाधाना कस्बे से करीब दो किलोमीटर दूर सीतापाठा का जंगल था। वहां एक शिव मंदिर है, जहां तक पहुंचने के लिए आज भी करीब 65 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. आज़ाद यहां पंडित का वेश बनाकर रहते थे, ताकि अंग्रेज़ों को कोई शक न हो. मंदिर के पास एक छोटा सा तालाब है, जहां वे स्नान किया करते थे. यही वह जगह है, जहां आज़ाद की वह मशहूर तस्वीर बनी थी, जिसमें वे स्नान के बाद मूंछों पर ताव देते नजर आते हैं. कहा जाता है कि उस वक्त खनियाधाना रियासत के चित्रकार भी वहां मौजूद थे और उन्होंने उस पल को कागज पर उतार दिया. आज वही तस्वीर आज़ाद की पहचान बन चुकी है।

पहाड़ियों में बनते थे बम, चट्टानों पर आज भी निशान
सीतापाठा मंदिर के पीछे की पहाड़ियों में आज भी बड़ी-बड़ी दरारें और गड्ढे नजर आते हैं. स्थानीय लोगों के मुताबिक, यही वे जगहें हैं जहां आज़ाद बम बनाकर उनका परीक्षण किया करते थे. यहां वे युवाओं को हथियार चलाने, निशाना लगाने और दुश्मन से मुकाबला करने के तरीके सिखाते थे. खनियाधाना के महाराज खलक सिंह जूदेव और चंद्रशेखर आज़ाद की मुलाकात एक संयोग से हुई थी, लेकिन यह संयोग इतिहास बन गया. कहा जाता है कि काकोरी कांड के बाद आज़ाद भूमिगत थे और एक गैराज में मैकेनिक का काम कर रहे थे. वहीं से महाराज की कार की सर्विसिंग के दौरान दोनों की मुलाकात हुई. एक घटना में आज़ाद की सटीक निशानेबाज़ी देखकर महाराज समझ गए कि यह कोई आम इंसान नहीं है.

नाम बदला, पहचान छुपाई और मिशन जारी रखा
महाराज ने आज़ाद को अंग्रेज़ों से बचाने के लिए उनका नाम बदल दिया और उन्हें मंदिर का पुजारी बना दिया. नया नाम रखा गया पंडित हरिशंकर शर्मा. दिन में आज़ाद जंगलों में बम बनाने और ट्रेनिंग का काम करते और रात में मंदिर या कभी-कभी महाराज के महल में रुकते थे. सीतापाठा के जंगलों में कई क्रांतिकारियों को ट्रेनिंग दी गई. बंदूक चलाने से लेकर रणनीति बनाने तक, सब कुछ यहीं सिखाया जाता था. अंग्रेज़ों को भनक तक नहीं लगती थी कि उनके खिलाफ साजिश इसी इलाके में पक रही है.

महाराज ने दिल खोलकर की मदद
महाराज खलक सिंह जूदेव ने आज़ाद की हर संभव मदद की. यहां तक कि जब आज़ाद ने पिस्टल की मांग की, तो महाराज ने सरकारी अनुमति लेकर दो रिवॉल्वर मंगवाईं. कागज़ों में एक रिवॉल्वर खोने की कहानी लिखी गई, लेकिन असल में वह हथियार आज़ाद तक पहुंच गया.

अंग्रेजों की नाराज़गी और महाराज का त्याग
क्रांतिकारियों को समर्थन देने की वजह से अंग्रेज़ महाराज से नाराज़ हो गए. उन्हें पद से हटाया गया, लेकिन जनता के विरोध के बाद फिर बहाल किया गया. आज़ाद की शहादत के बाद महाराज ने खुद सत्ता छोड़ दी और सादा जीवन जीने लगे. उन्होंने कभी किसी सरकारी सम्मान को स्वीकार नहीं किया. खनियाधाना उन गिनी-चुनी रियासतों में थी, जो कभी सीधे अंग्रेजों के अधीन नहीं आई. यहां के लोग और शासक हमेशा अंग्रेज़ों के खिलाफ रहे. यही वजह थी कि यह इलाका क्रांतिकारियों के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता था.

आज भी पहचान का इंतज़ार कर रहा सीतापाठा
आज हालात यह हैं कि चंद्रशेखर आज़ाद की इस कर्मभूमि को वो पहचान नहीं मिल पाई है, जिसकी यह हकदार है. न यहां कोई बड़ा स्मारक है, न नियमित आयोजन. स्थानीय लोग चाहते हैं कि सरकार यहां पर्यटन सुविधाएं विकसित करे और खनियाधाना को चंद्रशेखर आज़ाद की ऐतिहासिक धरती के रूप में देशभर में पहचान दिलाए.



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