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Agriculture Tips: मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में फरवरी का महीना सरसों की फसल के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इस समय फसल में फलियां बनने और दाने पड़ने (सीड फिलिंग) की प्रक्रिया तेज हो जाती है, जो अंतिम उपज तय करती है. लेकिन, इसी संवेदनशील चरण में फली खाने वाले कीड़ों का खतरा सबसे अधिक बढ़ जाता है. सीधी समेत आसपास के इलाकों में इन दिनों सरसों की फसल पर खतरा मंडरा रहा है.
खेतों में फलियां बनते ही इल्ली और अन्य कीट उन पर हमला कर रहे हैं. कीड़े फलियों में छेद कर अंदर के दानों को खा जाते हैं, जिससे फलियां अंदर से खोखली हो जाती हैं. प्रभावित फलियों पर छोटे-छोटे छेद और काले रंग की बीट दिखाई देती है. कई जगह पत्तियों और फूलों को भी नुकसान पहुंच रहा है.
वरिष्ठ कृषि अधिकारी संजय सिंह ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि फरवरी में फली छेदक (पॉड बोरर) का प्रकोप बढ़ जाता है, जिससे 20 से 40 प्रतिशत तक नुकसान संभव है. उन्होंने बताया कि यह कीट पहले फूलों पर हमला करता है और बाद में फलियों में छेद कर दानों को नष्ट कर देता है, इसलिए नियमित निगरानी बेहद जरूरी है.
जब 50 प्रतिशत से अधिक फलियां प्रभावित दिखें, तब अनुशंसित कीटनाशकों का 200 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें. इमामेक्टिन बेंजोएट 5% एसजी 80-100 ग्राम प्रति एकड़, स्पिनोसेड 45 एससी 60-70 मिलीलीटर, इंडोक्साकार्ब 14.5 एससी 200 मिलीलीटर या क्लोरोपाइरीफॉस 20% ईसी 400-500 मिलीलीटर प्रति एकड़ प्रभावी पाए गए हैं.
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पर्यावरण अनुकूल उपायों में नीम तेल 5 मिली प्रति लीटर पानी (1500 पीपीएम) का छिड़काव लाभकारी है. नीम सीड करनल एक्सट्रैक्ट (एनएसकेई) 5% का प्रयोग भी प्रभावी माना गया है. खेत में 5-6 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से लगाने से कीटों की संख्या पर निगरानी रखी जा सकती है.
संजय सिंह ने बताया कि छिड़काव सुबह या शाम के समय करें, जब मधुमक्खियां कम सक्रिय हों. यदि प्रकोप बना रहे तो 10-15 दिन बाद दूसरा स्प्रे करें. दवाओं का बार-बार एक ही प्रकार से उपयोग न करें, बल्कि बदल-बदल कर छिड़काव करें, ताकि कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित न हो.
संजय सिंह ने किसानों से अपील की कि बिना कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अंधाधुंध कीटनाशकों का प्रयोग न करें. सही समय पर पहचान, नियमित निगरानी और संतुलित प्रबंधन से सरसों की फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है.
सरसों की फसल की कटाई सही समय पर करना बेहद जरूरी है, वरना 25% तक नुकसान हो सकता है. जब 75-80% फलियां पीली और सुनहरी हो जाएं, तभी कटाई करें. अधिक हरी फसल में दाना सिकुड़ता है और तेल कम होता है, जबकि देर से कटाई पर फलियां चटककर बीज झड़ जाते हैं। कठोर दाना कटाई का संकेत है.