रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में पदस्थ कुलगुरु प्रो. राजेश वर्मा की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर शुक्रवार को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। न्यायालय ने राज्य सरकार को जवाब प्रस्तुत करने के लिए चार सप्ताह की अंतिम मोहलत दी है। यह सुनवाई जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ में हुई। याचिका एनएसयूआई के जिला अध्यक्ष सचिन रजक द्वारा दायर की गई है। नियुक्ति प्रक्रिया पर उठे सवाल याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता उत्कर्ष अग्रवाल ने पक्ष रखते हुए कहा कि प्रो. राजेश वर्मा की नियुक्ति नियम विरुद्ध तरीके से की गई है। नियमानुसार पीएचडी उपाधि के बाद कम से कम 10 वर्ष का शैक्षणिक अनुभव आवश्यक होता है, जबकि नियुक्ति प्रक्रिया में इन मापदंडों का पालन नहीं किया गया। याचिका में यह भी कहा गया है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा निर्धारित शैक्षणिक योग्यताओं का उल्लंघन किया गया है। यदि मूल रूप से प्राध्यापक पद पर नियुक्ति ही नियमों के विरुद्ध है, तो कुलगुरु पद पर नियुक्ति भी अवैध मानी जानी चाहिए। राज्य सरकार ने मांगा समय राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता वेद प्रकाश तिवारी उपस्थित रहे। सुनवाई के दौरान राज्य पक्ष ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा गया। न्यायालय के आदेश में उल्लेख किया गया कि प्रतिवादियों को 7 अप्रैल 2025 को नोटिस तामील किया जा चुका है, लेकिन अब तक जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया है। इस पर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने चार सप्ताह का अंतिम अवसर दिया है और निर्धारित समय में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। 23 मार्च को अगली सुनवाई गौरतलब है कि यह याचिका कुलगुरु की प्राध्यापक पद पर पूर्व नियुक्ति से संबंधित है, जिसमें प्रक्रिया में कथित विसंगतियों को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया है। मामले की अगली सुनवाई 23 मार्च को निर्धारित की गई है।
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