डीजे ने ठप किया पीढ़ियों का धंधा, लड़के फिर रहे बेरोजगार, परिवारों का दर्द

डीजे ने ठप किया पीढ़ियों का धंधा, लड़के फिर रहे बेरोजगार, परिवारों का दर्द


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Chhatarpur News: डीजे के आने के बाद शादियों में बैंड-बाजे का चलन कम हो गया है. इससे ढोल बजाने वाले परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो रहा है. अब उनके पास पहले जैसा काम नहीं है. रोजी-रोटी का संकट गहराता जा रहा है.

छतरपुर. मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में एक समय था, जब शादी कार्यक्रम में बैंड-बाजा बजाने की परंपरा थी लेकिन बढ़ते समय के साथ लोगों की दिलचस्पी ढोल-नगाड़े में कम होती गई और आज शादी-विवाह जैसे कार्यक्रमों में डीजे का उपयोग बढ़ता चला गया. इसके चलते ढोल बजाने वाले परिवार अब बेरोजगार हो गए हैं. उनका कहना है कि हमारे बच्चों का यही एक धंधा था, जिसे डीजे वालों ने छीन लिया है. छतरपुर की छोटी बाई लोकल 18 से बातचीत में बताती हैं कि जब से यह डीजे आ गया है, तब से हमें अपना परिवार चलाना मुश्किल हो गया है क्योंकि लोग अब शादियों में डीजे ज्यादा मंगाते हैं, जिससे हमारे धंधे पर संकट आ गया है. घर खर्च नहीं चल रहा है. मुश्किल से शादियों के सीजन में 2 से 4 बुकिंग मिलती हैं. उसी से जो मिला, उसमें राशन आदि खरीदना पड़ता है. लोग शादियों में बैंड-बाजा कम मंगाने लगे हैं. डीजे की ज्यादा डिमांड होने लगी है.

छोटी बाई बताती हैं कि 10 लोगों में से एक या दो लोग ही बैंड-बाजा करते हैं, सभी लोग नहीं करते हैं. गांव में तो करते हैं लेकिन अब वहां भी डीजे का उपयोग बढ़ने लगा है. गांव से लेकर शहर दोनों जगह डीजे की डिमांड बढ़ गई है.

ढोल वालों को भी बुलाते हैं
वह आगे बताती हैं कि बैंड-बाजा में 8 से 10 हजार रुपये मिल जाते हैं लेकिन लोग अब सिर्फ ढोल करते हैं. उसमें 1000 रुपये ही मिलते हैं. मालिक को नहीं बचते हैं. बैंड-बाजा में 10 हजार रुपये करीब मिल जाते हैं. जब डीजे नहीं चलता था, तब धंधा बढ़िया चलता था. 20 से 30 हजार रुपये आराम से मिल जाते थे. मिति मिल जाती थी.

बच्चे बेरोजगार, करेंगे पलायन
छोटी बाई बताती हैं कि हमारे बच्चे बहुत कमाऊ हैं, मेहनती हैं, पढ़े लिखे भी हैं. उनके पास यही काम था लेकिन काम ही नहीं मिल रहा. मजदूरी दिहाड़ी भी नहीं मिल रही, परदेस ही कमाने जाना पड़ेगा.

सालभर घर खर्च आराम से चलता था
छोटी बाई बताती हैं कि जब डीजे नहीं चलता था, तो शादियों की मिति इतनी मिलती थीं कि सालभर घर खर्च आराम से चलता था लेकिन अब शादी सीजन में कभी दो, कभी चार, 10 से ज्यादा मिति नहीं मिलती हैं. लोग ढोल तो कर लेते हैं लेकिन बैंड-बाजा में ज्यादा कमाई होती है. ढोल बजाने में 800 से 1000 रुपये ही मिलते हैं.

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Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.



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