Last Updated:
माही शुक्ला की जो बालाघाट के छोटे से कस्बे खैरलांजी की रहने वाली है. अब तक उनकी दो किताब छप चुकी है, जिसमें उन्होंने महज 16 साल की उम्र में पहली किताब लिखी थी. वहीं, अब उनकी दूसरी किताब भी प्रकाशित हो चुकी है. ऐसे में बालाघाट जिले की सबसे कम उम्र की साहित्यकार माही शुक्ला से लोकल 18 ने बातचीत की
Balaghat News: बालाघाट एक ऐसा जिला है, जहां की साक्षरता दर तो 77 प्रतिशत है, लेकिन जिला साहित्यकारों की कमी से जुझता रहा है. लेकिन, अब बालाघाट में कम उम्र के साहित्यकार उभर रहे हैं. एक ऐसी ही उभरती सहित्यकार हैं, जो बचपन से ही कविताओं को सुनती रहीं. फिर जीवन को ही कविता बना लिया. हम बात कर रहे हैं माही शुक्ला की, जो बालाघाट के छोटे से कस्बे खैरलांजी की हैं. अब तक उनकी दो किताब छप चुकी हैं, जिसमें उन्होंने महज 16 साल की उम्र में पहली किताब लिखी थी. वहीं, अब उनकी दूसरी किताब भी प्रकाशित हो चुकी है. ऐसे में बालाघाट जिले की सबसे कम उम्र की साहित्यकार माही शुक्ला से लोकल 18 ने बातचीत की, जानिए पूरी कहानी…
बचपन से ही थी साहित्य में दिलचस्पी
माही ने बताया, जिस उम्र में बच्चे खिलौने की जिद करते हैं, उस उम्र में मुझे कविताएं सुनने का शौक था. पिता के साथ गाड़ी में जाती तो उसी में कवि सम्मेलनों को सुनती थी. ऐसे में बचपन से ही कविताएं सुनने का चस्का लगा. फिर क्या था कभी नोट बुक तो कभी रफ कॉपी में लिखने लगी. लेकिन, मां को तो बच्ची की पढ़ाई की चिंता थी. मां हमेशा उन्हें डांटा करतीं कि बोर्ड परीक्षा है, पढ़ाई करो. लेकिन माही भी जिद्दी, कविताएं लिखने का शौक कम न हुआ. फिर क्या था 10वीं के रिजल्ट आने से पहले उनकी पहली किताब छप गई, जिसमें कई कविताएं तो कुछ कहानियां हैं. किताब छपते ही वह बालाघाट की सबसे कम उम्र की साहित्यकार बन गईं.
पढ़ाई के लिए छूटा साहित्य का साथ
आगे बताया, एक वक्त आया जिसमें उन्होंने पढ़ाई पर ध्यान दिया. पहले उन्होंने कम्प्यूटर साइंस में डिप्लोमा किया फिर ग्रेजुएशन के लिए ग्वालियर चली गईं. लेकिन, वहां भी लिखने का चस्का कम न हुआ. समय बीता, चुनौतियां आईं, लेकिन माही की कलम नहीं रुकी. जहां मंच और मौका मिलता वहां माही अपनी प्रतिभा का परिचय देतीं. शाबाशियां माही को हौसला देती रहीं. फिर महज 24 की उम्र में लिख दी अपनी दूसरी किताब. जब दूसरी पुस्तक प्रकाशित की, तो वह सिर्फ एक लेखिका नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की सबसे कम उम्र की रजिस्टर्ड ऑथर बन चुकी थीं. माही ने दूसरी किताब “पंख तेरे हैं” लिखी है, जो महिला सशक्तिकरण पर आधारित है. इसमें वह न सिर्फ महिला सशक्तिकरण की व्याख्या कर रही हैं, बल्कि सुडो फेसुडो-फेमिनिज्म यानी “छद्म नारीवाद” पर प्रहार भी करती हैं. वह सुभद्रा कुमारी चौहान को अपनी आदर्श मानती हैं.
मंजिल अभी बाकी है..
माही अब रुकना नहीं चाहतीं, आगे बढ़ना चाहती हैं. इंजिनियरिंग की पढ़ाई कर चुकी माही अब हिंदी साहित्य में एमए की पढ़ाई करना चाहती हैं. वह समाज सेवा कर समाज सुधार में अपना योगदान देना चाहती है.
About the Author
एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय. प्रिंट मीडिया से शुरुआत. साल 2023 से न्यूज 18 हिंदी के साथ डिजिटल सफर की शुरुआत. न्यूज 18 के पहले दैनिक जागरण, अमर उजाला में रिपोर्टिंग और डेस्क पर कार्य का अनुभव. म…और पढ़ें