कॉन्सटेबल के बेटे की कहानी रुला देगी, कभी बैट तोड़ा तो कभी टूटे सपने

कॉन्सटेबल के बेटे की कहानी रुला देगी, कभी बैट तोड़ा तो कभी टूटे सपने


नई दिल्ली. देश की राजधानी दिल्ली की एक साधारण पुलिस कॉलोनी से उठी एक ख़ामोश सी महत्वाकांक्षा, मरीन ड्राइव की लहरों के सामने बैठा एक बेचैन युवा, और आत्म-संदेह से जूझता एक प्रतिभाशाली बल्लेबाज़ इन सबने मिलकर जिस कहानी को जन्म दिया, उसका चरम एक सांस रोक देने वाली कोलकाता की रात में लिखा गया. यह सिर्फ़ 97 रन की पारी नहीं थी. यह धैर्य की जीत थी. यह विश्वास की वापसी थी. यह एक ऐसे खिलाड़ी का पुनर्जन्म था, जिसे कभी ‘प्लान-बी’ कहा गया .

40 साल पहले एक लैटिन कैथलिक मलयाली परिवार रोज़गार की तलाश में दिल्ली आया था. पिता सैमसन विश्वनाथन को दिल्ली पुलिस में कॉन्स्टेबल की नौकरी मिली. उत्तरी दिल्ली के जीटीबी नगर की पुलिस कॉलोनी में पला-बढ़ा उनका बेटा शायद नहीं जानता था कि एक दिन वह करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों का चेहरा बनेगा. फुटबॉल खिलाड़ी रहे पिता ने संतोष ट्रॉफी में दिल्ली का प्रतिनिधित्व किया था, पर बेटे ने बल्ला चुना जिसकी गूंज का एहसास आज पूरा विश्व कर रहा है.

प्रतिभा निखारने के लिए पिता का त्याग

पूत के पांव पालने में ही नजर आने लगते है इस कहावत को चरितार्थ होते 11 नवंबर 1994 को देखने को मिला.  संजू सैमसन ने बहुत कम उम्र में प्रतिभा के संकेत दे दिए थे. दिल्ली की अंडर-13 टीम में जगह बनाई. जब पिता को बेटे में भविष्य दिखा, उन्होंने नौकरी से वीआरएस लिया और परिवार केरल लौट गया. वहीं से सफर ने नई दिशा पकड़ी. 2011 में केरल के लिए प्रथम श्रेणी क्रिकेट में पदार्पण. 17 साल की उम्र में आईपीएल. 2013 में राजस्थान रॉयल्स के साथ डेब्यू और उसी सीज़न ‘बेस्ट यंग प्लेयर ऑफ द सीज़न’ का खिताब.

टूटे बैट से पूरा किया ख्वाब

संजू के लिए राष्ट्रीय टीम का रास्ता आसान नहीं था. 2014 में वनडे टीम में नाम आया, पर मौका नहीं मिला. 2015 में टी20 से अंतरराष्ट्रीय शुरुआत, फिर पाँच साल का लंबा सन्नाटा. न टीम इंडिया में जगह, न निरंतरता. एक समय ऐसा भी आया जब केरल की टीम से भी बाहर कर दिए गए. आत्म-संदेह ने दस्तक दी. एक इंटरव्यू में संजू ने  स्वीकार किया था कि वह दौर बेहद कठिन था. “आप अपनी काबिलियत पर शक करने लगते हैं.” एक मैच में आउट होकर उन्होंने गुस्से में बैट तोड़ दिया और ब्रेबोर्न स्टेडियम से निकलकर मरीन ड्राइव पर जाकर बैठ गए. ढाई घंटे तक समुद्र को देखते रहे. सोचा, क्या क्रिकेट छोड़ देना चाहिए. रात को लौटे तो टूटा बैट याद आयाऔर बहुत पछतावा हुआ.

12 साल का इंतजार 

वही टूटा बैट, वही बेचैनी, वही पाँच साल दरअसल एक महान क्षण की प्रस्तावना थे. 2026 के विश्व कप में भारत का सफर डगमगाया हुआ था. कोलकाता में वेस्टइंडीज़ के खिलाफ करो या मरो का मुकाबला. सामने 195 रन का लक्ष्य. शुरुआत लड़खड़ाई. रन-रेट चढ़ता गया. 11वें ओवर में सूर्यकुमार यादव के आउट होते ही दबाव चरम पर था. तभी क्रीज़ पर थे संजू.उन्होंने आक्रामकता नहीं, संयम चुना. 26 गेंदों में अर्धशतक. 50 गेंदों पर 97 नाबाद. एक भी लापरवाह शॉट नहीं. जब साथ में विकेट गिरते रहे, उन्होंने खुद को रोका. खेल को पढ़ा. इंतज़ार किया. और आख़िरी ओवर में सात रन चाहिए थे.पहली गेंद छक्का. दूसरी गेंद मिड-ऑन के ऊपर से चौका. स्टेडियम फट पड़ा. भारत सेमीफाइनल में. और संजू घुटनों के बल बैठकर आसमान की ओर देख रहे थे. वह जश्न नहीं था. वह वर्षों के इंतज़ार का विसर्जन था.

मैन ऑफ द मैच बने संजू सैमसन ने कहा, “यह मेरे लिए पूरी दुनिया के बराबर है. जिस दिन से खेलना शुरू किया, देश के लिए खेलने का सपना देखा. कई बार खुद पर शक किया. लेकिन आज मैं सर्वशक्तिमान का शुक्रगुज़ार हूँ.” यह शतक नहीं था. पर शायद उनके जीवन की सबसे बड़ी पारी थी. क्योंकि उस रात उन्होंने सिर्फ़ 97 रन नहीं बनाए. उन्होंने अपने अतीत को जवाब दिया. आत्म-संदेह को हराया. और साबित किया कि कभी-कभी ‘प्लान-बी’ ही इतिहास लिखता है.



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